मुख्य सचिव दीपक सिंघल काम में कोताही बरतने वाले अफसरों को जेल भेजने तक की भारी-भरकम चेतावनी दे रहे हैं लेकिन उनकी सरकार की दागी अफसरों पर मेहरबानी किसी से छिपी नहीं है। कभी चहेते अफसरों के खिलाफ चल रही जांच को लटकाया जाता है तो कभी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है।
अभियोजन की मंजूरी देने में हीलाहवाली की जाती है। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के दागी अफसरों को प्राइम पोस्टिंग तक दे दी जाती है। कार्रवाई तभी होती है जब अदालत का डंडा चले, यहां तक कि जेल जाने के बावजूद अफसरों के निलंबन में देरी की गई।
केस-1 : नोएडा फॉर्म हाउस आवंटन घोटाले की जांच में नोएडा के तत्कालीन अध्यक्ष मोहिन्दर सिंह की भूमिका पर अंगुली उठी। वह 31 जुलाई 2014 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
केस-2: नोएडा जमीन आवंटन घोटाले के आरोपी तत्कालीन सीईओ राजीव कुमार को प्रमुख सचिव नियुक्ति जैसे अहम पद से तब तक नहीं हटाया गया जब तक हाईकोर्ट ने कड़ा रुख नहीं अपनाया।
केस-3: एनआरएचएम घोटाले में तत्कालीन प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला एक माह जेल में रहने के बावजूद तब निलंबित किया गया जब हाईकोर्ट ने सख्त तेवर दिखाए।
केस-4: नोएडा अथॉरिटी के इंजीनियर इन चीफ यादव सिंह पर तमाम मेहरबानियों के बाद उनके खिलाफ सीबीआई जांच के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।
केस-5: गोमतीनगर में 27 अति विशिष्ट लोगों को एलडीए द्वारा प्लाट आवंटित किए जाने का केस सरकार ने शीर्ष अदालत में वापस ले लिया। प्लांट आवंटन के लिए जिम्मेदार अफसरों को क्लीन चिट दे दी गई।
अफसरशाही के प्रति सरकार के नरम रुख के ये चंद उदाहरण बानगी भर हैं। ऐसे मामलों की लंबी फेहरिस्त है। उन्हें बचाने के हर जतन किए गए। कायदे-कानून ताक पर रख दिए गए। नोएडा के घोटालेबाज चीफ इंजीनियर यादव सिंह को न केवल बहाल किया गया, उनके खिलाफ हाईकोर्ट में सीबीआई जांच के आदेश हुए हैं तो सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे डाली।
सरकार के कई अफसरों के खिलाफ जांच ठंड बस्ते में पड़ी हुई हैं। जांच पूरी भी हुई तो अभियोजन की मंजूरी नहीं मिल पाती है। जिन मामलों मे अफसरों पर कार्रवाई जरूरी होती है वहां उनके प्रति सरकार की पसंदगी-नापसंदगी देखी जाती है।