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मुख्य सचिव चेतावनी भले ही दें लेकिन दागियों को जेल भेजना मुश्किल

Thu, 11 Aug 2016 12:25 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
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फाइल फोटो
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मुख्य सचिव दीपक सिंघल काम में कोताही बरतने वाले अफसरों को जेल भेजने तक की भारी-भरकम चेतावनी दे रहे हैं लेकिन उनकी सरकार की दागी अफसरों पर मेहरबानी किसी से छिपी नहीं है। कभी चहेते अफसरों के खिलाफ चल रही जांच को लटकाया जाता है तो कभी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में डाल दी जाती है। 
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अभियोजन की मंजूरी देने में हीलाहवाली की जाती है। इतना ही नहीं भ्रष्टाचार के दागी अफसरों को प्राइम पोस्टिंग तक दे दी जाती है। कार्रवाई तभी होती है जब अदालत का डंडा चले, यहां तक कि जेल जाने के बावजूद अफसरों के निलंबन में देरी की गई।

केस-1 : नोएडा फॉर्म हाउस आवंटन घोटाले की जांच में नोएडा के तत्कालीन अध्यक्ष मोहिन्दर सिंह की भूमिका पर अंगुली उठी। वह 31 जुलाई 2014 को सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है।
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केस-2: नोएडा जमीन आवंटन घोटाले के आरोपी तत्कालीन सीईओ राजीव कुमार को प्रमुख सचिव नियुक्ति जैसे अहम पद से तब तक नहीं हटाया गया जब तक हाईकोर्ट ने कड़ा रुख नहीं अपनाया। 

केस-3: एनआरएचएम घोटाले में तत्कालीन प्रमुख सचिव प्रदीप शुक्ला एक माह जेल में रहने के बावजूद तब निलंबित किया गया जब हाईकोर्ट ने सख्त तेवर दिखाए। 

केस-4: नोएडा अथॉरिटी के इंजीनियर इन चीफ यादव सिंह पर तमाम मेहरबानियों के बाद उनके खिलाफ सीबीआई जांच के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ प्रदेश सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई।

केस-5: गोमतीनगर में 27 अति विशिष्ट लोगों को एलडीए द्वारा प्लाट आवंटित किए जाने का केस सरकार ने शीर्ष अदालत में वापस ले लिया। प्लांट आवंटन के लिए जिम्मेदार अफसरों को क्लीन चिट दे दी गई।
 
अफसरशाही के प्रति सरकार के नरम रुख के ये चंद उदाहरण बानगी भर हैं। ऐसे मामलों की लंबी फेहरिस्त है। उन्हें बचाने के हर जतन किए गए। कायदे-कानून ताक पर रख दिए गए। नोएडा के घोटालेबाज चीफ इंजीनियर यादव सिंह को न केवल बहाल किया गया, उनके खिलाफ हाईकोर्ट में सीबीआई जांच के आदेश हुए हैं तो सरकार ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे डाली। 

सरकार के कई अफसरों के खिलाफ जांच ठंड बस्ते में पड़ी हुई हैं। जांच पूरी भी हुई तो अभियोजन की मंजूरी नहीं मिल पाती है। जिन मामलों मे अफसरों पर कार्रवाई जरूरी होती है वहां उनके प्रति सरकार की पसंदगी-नापसंदगी देखी जाती है। 

फार्म हाउस घोटाले में नहीं हुआ कुछ

डेमो
सपा ने जिन घोटालों को मुद्दा बनाकर पूर्ववर्ती मायावती सरकार पर निशाना साधा था उसमें नोएडा फॉर्म हाउस घोटाला भी था। इसमें आईएएस अधिकारी मोहिंदर सिंह का भी नाम आया था। सपा सत्ता में आई, जांच बैठी।

नोएडा के तत्कालीन चेयरमैन राकेश बहादुर ने जांच की। उन्होंने पहले चरण में 650 करोड़ व दूसरे चरण में 350 करोड़ के इस घोटाले में नोएडा के तत्कालीन अध्यक्ष मोहिन्दर सिंह की भूमिका पर अंगुली उठाई गई। 

यह रिपोर्ट तभी आ गई थी जब मोहिंदर सिंह नौकरी में थे। 31 जुलाई 2014 को वे सेवानिवृत्त हो गए लेकिन रिपोर्ट पर कार्रवाई अभी तक नहीं हुई है। इस मामले में 14 और अफसर फंसे हैं।

बसपा शासन में राज्य चीनी निगम की मिलों को बेचने में घोटाला भी खूब चर्चा में रहा। आईएएस अफसरों ने टेंडर शर्तों में बदलाव कर सस्ते में ये मिलें बेच दीं।

इससे सरकारी खजाने को 1190 करोड़ की चपत लगी। इस मामले में सीएजी की रिपोर्ट से कई लोग संदेह के दायरे में आए। सपा नेता इस मामलों को उठाकर सरकार की घेराबंदी करते थे।

भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयोग बनाने की घोषणा करते थे। सपा सरकार के कार्यकाल का आखिरी साल चल रहा है लेकिन अभी तक भी इस मामले में इस कुछ नहीं हुआ।
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मेहरबानी पाने वाले कम नहीं

डेमो
सरकार की मेहरबानी पाने वाले वालों में नोएडा प्लाट आवंटन मामले में बसपा सरकार में निलंबित किए गए संजीव सरन, राकेश बहादुर, रवींद्र नायक और सेवानिवृत्त हो चुके देवदत्त तक शामिल रहे हैं। 

लगभग 400 करोड़ रुपये का यूपीएसआईडीसी घोटाला भी कम चर्चा में नहीं रहा। इसके मुख्य आरोपी यूपीएसआईडीसी के तत्कालीन मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा पर भी सरकार की कम मेहरबानी नहीं रही। 

भ्रष्टाचार और अफसरों पर सरकार की नरमी पर अदालतें टिप्पणी कर चुकी हैं। एक टिप्पणी में अदालत ने कहा था, ...उत्तर प्रदेश की नौकरशाही के एक धड़े के राजनीतिक गठजोड़ के कारण ब्यूरोक्रेसी में ब्रेकडाउन होना प्रतीत होता है। ....राजनीतिक गठजोड़ से नौकरशाही ध्वस्त हो गई है। 
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