मकान मालिक ने आते समय आधार कार्ड की फोटोकॉपी ले ली। बर्तन भी नहीं ले जाने दिए। बोला कि लौटकर आना और किराया देकर बर्तन ले लेना। इतना बताते ही बिहार के करवल निवासी राजेश कुमार, संतोष कुमार, सोना यादव, वीरेंद्र कुमार, राजकुमार और कमल गुप्ता की आंखें भर आईं।
आपबीती बताते हुए सभी ने बताया कि कुछ सपने लेकर 18 मार्च को दिल्ली गए थे। साथी की मदद से पीतमपुरा के पास एक खोली ली, जिसमें प्रति व्यक्ति एक हजार किराया था। खोली में 5 लोग रहते थे। तीन दिन मजदूरी की और 22 को लॉकडाउन हो गया।
21 दिन किसी तरह कट गए। जब लॉकडाउन बढ़ने लगा तो धैर्य जवाब देने लगा। 24 घंटे में एक बार खाना मिलता था। वह भी इतना कम कि पेट भी नहीं भरता था। ऊपर से मकान मालिक किराए को लेकर दबाव बना रहा था। परेशान होकर पांच मई को पैसे जुटाकर पुरानी साइकिलें खरीदीं।
इसके बाद एक साइकिल पर दो लोग सवार हुए और सामान लाद के बिहार के लिए निकल पड़े। शनिवार शाम पांच बजे लखनऊ के उतरेठिया तिराहे पर पहुंचे। राजेश ने बताया कि सोचा था कि अपनी टूटी झोपड़ी की मरम्मत करा दूंगा। बूढ़े मां बाप को कुछ नए कपड़े बनवा दूंगा, लेकिन सब खत्म हो गया।