म्यूकॉरमाइकोसिस के बाद एस्परजिलोसिस के खतरे को देखते हुए कोरोना को मात देने वाले मरीजों को बेहद सावधान रहना होगा। चूंकि इनमें इम्यूनिटी काफी कमजोर होती है, ऐसे में घर से लेकर बाहर तक हाइजीन अपनाने की जरूरत है। मरीज की समय-समय पर कल्चर जांच कराएं। ब्लड शुगर कंट्रोल रखें। अस्पताल से घर पहुंचे तो धूल वाली जगह या खेत में जाने से बचें। ठीक होने के बाद भी कुछ दिन तक मास्क लगाएं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पहले से प्रतिरक्षा से जुड़ी बीमारी की चपेट में है तो खतरा ज्यादा है। ऐसे में लक्षण दिखते ही चिकित्सक से सलाह लें।
केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि एस्परजिलस फंगस सांस के साथ अंदर जाते हैं, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाएं उन्हें नष्ट कर देती हैं। लेकिन जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है अथवा स्टेरॉयड सहित अन्य दवाएं लेते हैं उनकी प्रतिरक्षी कोशिकाएं कम होने की वजह से यह शरीर में छुप जाता है और फेफड़े में संक्रमण फैलाता है। यदि मरीज की स्थिति सामान्य है तो उसे कोर्टिकोस्टेरॉयड के साथ एंटीफंगल दवाएं दी जाती हैं। इसके बाद भी फंगस का असर बरकरार रहता है तो संबंधित क्षेत्र की सर्जरी करके उसे निकालना पड़ता है।
इन्हें ज्यादा खतरा
केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि कोरोना को मात देने वाले अस्थमा अथवा सिस्टिक फाइब्रोसिस से पीड़ित लोगों को सांस लेनेे में समस्या हो अथवा खांसी आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डॉ. वर्मा ने बताया कि जो लोग लंबे समय से बीमार हैं और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता है। फेफड़े में वायु के लिए रिक्त स्थान बन गए हैं। जो लोग स्टेराएड, डायबिटीज, एचआईवी आदि की नियमित तौर पर दवाएं ले रहे होते हैं। जिन्हें ब्लड कैंसर हो अथवा कीमोथेरेपी हो रही है। अंग प्रत्यारोपण कराने वाले मरीजों को भी इससे खतरा रहता है।
अन्य बैक्टीरिया और फंगस का भी हमला
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वायरस को मात देने वाले कई मरीजों में दूसरे तरह के बैक्टीरिया व फंगस का हमला पाया जा रहा है। कई मरीजों में सेप्टिसीमिया हो जाता है। कई बार संक्रमण की वजह से मल्टी ऑर्गन फेल्योर भी हो रहे हैं। ऐसे में आईसीयू में भर्ती मरीजों की समय-समय ब्लड मार्कर व कल्चर टेस्ट शुरू कर दिया गया है। गंभीर मरीजों में ई-कोलाई, क्लेबसिएला, स्टेफाइलोकोकस, स्युडोमोनाज, ए सिनेटो बैक्टर बैक्टीरिया, कैंडिडा ओरिश फंगस समेत अन्य फंगस पाए जाते हैं।
फंगल इंफेक्शन की वजह
केजीएमयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के डॉ. प्रशांत गुप्ता का कहना है कि फंगल इन्फेक्शन पहले भी होता रहा है। पहले कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों की संख्या कम होती थी। कैंसर, ट्रांसप्लांट अथवा अन्य गंभीर मरीजों में कभी-कभार म्यूकर माइकोसिस, एसपरजिलोसिस जैसे फंगस मिलते रहे हैं। इन दिनों उन मरीजों के साथ दूसरे मरीजों की भी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। कुछ की कोविड की वजह से तो कुछ को कोरोना से बचाने के लिए दी गई दवाओं की वजह से। ऐसे में फंगस का हमला होने पर शरीर में मौजूद एंटी फंगल सेल उनका सामना नहीं कर पा रहे हैं।
जांच से होती पहचान
लक्षण के आधार पर मरीज का एक्सरे, सीटी स्कैन करा कर देखा जाता है। जरूरत पड़ने पर स्पुटम कल्चर टेस्ट होता है। इसके बाद भी स्थिति साफ न होने पर बायोप्सी कराई जात है। फेफड़े के ऊतक लेकर उनका एंटी फंगल टेस्ट किया जाता है।