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यूपी: कोरोना मरीजों पर अब एस्परजिलोसिस का खतरा, फेफड़े में छेद बना देता है यह जानलेवा फंगस

Fri, 21 May 2021 02:58 PM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ/चंद्रभान यादव 

सार

कोरोना महामारी के साथ ब्लैक फंगस से निपटने से पहले एस्परजिलोसिस बीमारी का भी खतरा आ गया है। राहत की बात है कि यह फंगस संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में नहीं फैल पाता है।
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कोरोनावायरस से प्रभावित फेफड़े की 3D तस्वीर - फोटो : Sky News
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विस्तार
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कोरोना महामारी के बीच म्यूकॉरमायकोसिस (ब्लैक फंगस) से निपटने से पहले एस्परजिलोसिस बीमारी का भी खतरा आ गया है। पोस्ट कोविड मरीजों में इसके फंगस मिलने लगे हैं। केजीएमयू के चार मरीज इससे पीड़ित हैं। ऐसे में चिकित्सा विशेषज्ञ मंथन में जुट गए हैं कि प्रतिरक्षा तंत्र के कमजोर होने पर कौन-कौन से फंगस हमला कर सकते हैं और उनसे मरीजों से कैसे बचाया जाए। राहत की बात है कि यह फंगस संक्रमित व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में नहीं फैल पाता है।

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केजीएमयू में एस्परजिलोसिस मरीजों की पुष्टि करते हुए चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि इनका इलाज भी म्यूकॉरमायकोसिस की तरह किया जा रहा है। कई बार यह फंगस फेफड़े के अंदर छेद बना देता है। लंबे समय से फेफड़ों की बीमारी से ग्रसित और कीमोथेरेपी करने वाले मरीजों को लेकर बेहद चौकन्ना रहना होगा। इन मरीजों पर इस फंगस का हमला ज्यादा होता है। तय किया गया है कि ब्लैक फंगस की तरह जिन मरीजों में दूसरे फंगस के लक्षण हैं उनका भी एंटी फंगल टेस्ट अनिवार्य रूप से कराया जाए।

क्या है एस्परजिलोसिस
एस्परजिलोसिस बीमारी के फंगस की पहचान 1721 में इटली में हुई थी। इसकी 200 से अधिक प्रजातियां हैं। यह चमड़े के सामान, शीशे, पत्ती के सड़ने अथवा उसके ऊपर नमी बने रहने से होता है। शरीर में इसके पहुंचने पर जब सेल मुकाबला नहीं कर पाते तो यह फंगस एस्परजिलोसिस की वजह बनता है। इस फंगस की चपेट में हर व्यक्ति आता है, लेकिन जो फेफड़े से संबंधित बीमारी से ग्रसित हैं अथवा प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होती है, उन पर ज्यादा खतरा होता है।
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बीमारी के लक्षण
बलगम के साथ खून, सांस फूलना, लगातार बुखार, सीने की हड्डियों में दर्द, त्वचा में घाव बनने जैैसी स्थिति हो तो चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए। इसी तरह जिनमें एलर्जी ब्रोंकोपल्मोनरी एस्परजिलोसिस होती है, उनमें खांसी के साथ सांस लेने में दिक्कत होती है। जिन लोगों की प्रतिरोधक क्षमता बेहद कमजोर होती है उनमें इनवेसिव एस्परजिलोसिस होती है। इसमें पहले फेफड़े प्रभावित होते हैं और फिर किडनी और ब्रेन तक संक्रमण हो सकता है।

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एस्परजिलोसिस से बचना है तो हाइजीन पर दें विशेष ध्यान

म्यूकॉरमाइकोसिस के बाद एस्परजिलोसिस के खतरे को देखते हुए कोरोना को मात देने वाले मरीजों को बेहद सावधान रहना होगा। चूंकि इनमें इम्यूनिटी काफी कमजोर होती है, ऐसे में घर से लेकर बाहर तक हाइजीन अपनाने की जरूरत है। मरीज की समय-समय पर कल्चर जांच कराएं। ब्लड शुगर कंट्रोल रखें। अस्पताल से घर पहुंचे तो धूल वाली जगह या खेत में जाने से बचें। ठीक होने के बाद भी कुछ दिन तक मास्क लगाएं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पहले से प्रतिरक्षा से जुड़ी बीमारी की चपेट में है तो खतरा ज्यादा है। ऐसे में लक्षण दिखते ही चिकित्सक से सलाह लें।

केजीएमयू के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. डी हिमांशु ने बताया कि एस्परजिलस फंगस सांस के साथ अंदर जाते हैं, तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाएं उन्हें नष्ट कर देती हैं। लेकिन जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है अथवा स्टेरॉयड सहित अन्य दवाएं लेते हैं उनकी प्रतिरक्षी कोशिकाएं कम होने की वजह से यह शरीर में छुप जाता है और फेफड़े में संक्रमण फैलाता है। यदि मरीज की स्थिति सामान्य है तो उसे कोर्टिकोस्टेरॉयड के साथ एंटीफंगल दवाएं दी जाती हैं। इसके बाद भी फंगस का असर बरकरार रहता है तो संबंधित क्षेत्र की सर्जरी करके उसे निकालना पड़ता है।

इन्हें ज्यादा खतरा
केजीएमयू रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के डॉ. अजय वर्मा ने बताया कि कोरोना को मात देने वाले अस्थमा अथवा सिस्टिक फाइब्रोसिस से पीड़ित लोगों को सांस लेनेे में समस्या हो अथवा खांसी आए तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। डॉ. वर्मा ने बताया कि जो लोग लंबे समय से बीमार हैं और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता है। फेफड़े में वायु के लिए रिक्त स्थान बन गए हैं। जो लोग स्टेराएड, डायबिटीज, एचआईवी आदि की नियमित तौर पर दवाएं ले रहे होते हैं। जिन्हें ब्लड कैंसर हो अथवा कीमोथेरेपी हो रही है। अंग प्रत्यारोपण कराने वाले मरीजों को भी इससे खतरा रहता है।

अन्य बैक्टीरिया और फंगस का भी हमला
चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना वायरस को मात देने वाले कई मरीजों में दूसरे तरह के बैक्टीरिया व फंगस का हमला पाया जा रहा है। कई मरीजों में सेप्टिसीमिया हो जाता है। कई बार संक्रमण की वजह से मल्टी ऑर्गन फेल्योर भी हो रहे हैं। ऐसे में आईसीयू में भर्ती मरीजों की समय-समय ब्लड मार्कर व कल्चर टेस्ट शुरू कर दिया गया है। गंभीर मरीजों में ई-कोलाई, क्लेबसिएला, स्टेफाइलोकोकस, स्युडोमोनाज, ए सिनेटो बैक्टर बैक्टीरिया, कैंडिडा ओरिश फंगस समेत अन्य फंगस पाए जाते हैं।

फंगल इंफेक्शन की वजह
केजीएमयू के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के डॉ. प्रशांत गुप्ता का कहना है कि फंगल इन्फेक्शन पहले भी होता रहा है। पहले कमजोर प्रतिरक्षा वाले मरीजों की संख्या कम होती थी। कैंसर, ट्रांसप्लांट अथवा अन्य गंभीर मरीजों में कभी-कभार म्यूकर माइकोसिस, एसपरजिलोसिस जैसे फंगस मिलते रहे हैं। इन दिनों उन मरीजों के साथ दूसरे मरीजों की भी प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है। कुछ की कोविड की वजह से तो कुछ को कोरोना से बचाने के लिए दी गई दवाओं की वजह से। ऐसे में फंगस का हमला होने पर शरीर में मौजूद एंटी फंगल सेल उनका सामना नहीं कर पा रहे हैं।

जांच से होती पहचान
लक्षण के आधार पर मरीज का एक्सरे, सीटी स्कैन करा कर देखा जाता है। जरूरत पड़ने पर स्पुटम कल्चर टेस्ट होता है। इसके बाद भी स्थिति साफ न होने पर बायोप्सी कराई जात है। फेफड़े के ऊतक लेकर उनका एंटी फंगल टेस्ट किया जाता है।
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