लखनऊ। प्रदूषण बढ़ने से क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज (सीओपीडी) के मरीज बढ़ रहे हैं। दुनिया भर में सीओपीडी से होने वाली मौतों में से एक चौथाई भारत से हैं। विश्व सीओपीडी दिवस की पूर्व संध्या पर आयोजित जागरूकता कार्यक्रम में केजीएमयू के रेस्पिरेटरी मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष प्रो. सूर्यकांत ने मंगलवार को यह जानकारी दी।
प्रो. सूर्यकांत ने बताया कि धूम्रपान, चूल्हे से निकलने वाला धुआं और लंबे समय तक बने रहने वाला फेफड़े का संक्रमण भी सीओपीडी के लिए जिम्मेदार है। इन्हेलर इसका सबसे प्रभावी इलाज है। यह सीधे फेफड़े में पहुंचता है, जबकि बाकी दवाएं खून में जाती हैं। इन्हेलर के दुष्प्रभाव भी कम हैं।
बीमारी के लक्षण 30 वर्ष की उम्र के बाद दिखने लगते हैं। सुबह-सुबह खांसी आने से इसकी शुरुआत होती है। फिर साल भर खांसी, बलगम आता है। बीमारी बढ़ने पर सांस फूलने लगती है। सीओपीडी से दिल, गुर्दा व अन्य अंग भी प्रभावित होते हैं। कार्यक्रम में डॉ. संतोष कुमार, डॉ. अजय कुमार वर्मा, डॉ. ज्योति बाजपेयी, डॉ. अंकित कुमार और डॉ. शिवम श्रीवास्तव मौजूद रहे।
दुनिया में मौत का तीसरा बड़ा कारण
केजीएमयू के पल्मोनरी और क्रिटिकल केयर मेडिसिन विभाग में आयोजित प्रेसवार्ता में विभागाध्यक्ष प्रो. वेद प्रकाश ने बताया कि सीओपीडी दुनिया में मौत का तीसरा प्रमुख कारण है। भारत में 5.5 करोड़ से अधिक लोग इससे पीड़ित हैं। बढ़ता प्रदूषण और खराब होता वायु गुणवत्ता सूचकांक इसका जोखिम बढ़ाता है।
सीओपीडी के सामान्य लक्षण
पुरानी खांसी, सांस लेने में तकलीफ, घरघराहट, सीने में जकड़न, थकान, अनपेक्षित वजन घटना।