पापा ने कहा था बिटिया खूब नाम कमाओ। इसलिए मैंने पढ़ाई में जान लगा दी। लखनऊ विश्वविद्यालय ने ये मेडल भले ही मुझे दिए हों पर इनके पीछे की पूरी मेहनत मेरे पापा की है।
परिवार में थोड़ी-सी खेती के सिवाय आय का कोई दूसरा जरिया नहीं है। सुख-सुविधा तो दूर घर चलाना तक मुश्किल था। इसके बावजूद सातों भाई-बहनों की पढ़ाई के लिए उन्होंने अपनी जान लगा दी।
तमन्ना यही थी कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर नाम कमा सकें। इसलिए ये मेडल मेरे पापा की अमानत हैं। ये शब्द हैं मास्टर ऑफ सोशल वर्क के सभी पांचों मेडल पर कब्जा जमाने वाली छात्रा अल्पिका त्रिपाठी के।
हर ख्वाहिश को दरकिनार कर बच्चों के लिए जीती रही मां
रायबेरली के बछरावां क्षेत्र के राजामऊ गांव की अल्पिका ने लखनऊ विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में पांच मेडल जीतकर अपने पापा डीपी त्रिपाठी के साथ ही अपने पूरे गांव का नाम रोशन कर दिया।
अल्पिका के अनुसार इस सफलता में उनकी मां शैल त्रिपाठी का योगदान भी बेहद अहम है। क्योंकि हर ख्वाहिश को दरकिनार करके वे सिर्फ अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए जीती रहीं।
अल्पिका के घर पर उसके बड़े भाई अतुल त्रिपाठी, विपुल त्रिपाठी, प्रफुल्ल त्रिपाठी के साथ ही छोटा भाई मृदुल और बहन आत्मिका त्रिपाठी हैं।
बड़े भाई अतुल इंश्योरेंस एजेंट हैं, जबकि विपुल ने संविदा पर एक कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया है। बाकी अभी पढ़ाई कर रहे हैं।
नहीं थे इंजीनियरिंग के लिए पैसे
अल्पिका के अनुसार उसने सोचा था कि बीटेक करने के बाद सिविल सर्विस जॉइन करूंगी। मगर, घर की माली हालत यहां जवाब दे गई। मजबूरी और मायूसी के साथ बीए में दाखिला लिया पर पढ़ाई का उत्साह बरकरार रहा।
इसी लगन में उसने सोशल वर्क में सबसे ज्यादा नंबर हासिल किए। बीए के बाद एमए सोशल वर्क में दाखिला ले लिया। मेहनत रंग लाई और फाइनल इयर में उसे नाम पांच गोल्ड मेडल मिले।
समाज की सेवा को जॉइन करना है सिविल सर्विसेस
अल्पिका के अनुसार उसका मकसद सिविल सर्विसेस जॉइन करना है। इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।
उनके अनुसार सिविल सेवा ऐसी नौकरी है, जिसके दम पर वो समाज की सेवा कर सकती हैं। नौकरी मिलेगी तो घर की आर्थिक दशा भी सुधरेगी। साथ ही यूजीसी नेट का पेपर भी दे रही हैं।