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जहां थी, वहीं ठहर गई... अयोध्या तो बस सपनों को जी रही

Tue, 06 Dec 2016 02:33 AM IST
इंदुभूषण पांडेय/अमर उजाला, अयोध्या
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कभी मंदिर/मस्जिद विवाद का गहरा दंश झेल चुकी अयोध्या आज भी गहरे सवालों से उबरी नहीं है। राम की नगरी का महत्वपूर्ण रामकोट क्षेत्र हो या रामघाट का इलाका, यहां पहुंच जाइए तो अनायास ही एक ठहरी व नि:शक्त जैसी अयोध्या का एक अक्स जे़हन में पैठ कर जाता है।
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लगता है कि जैसे अयोध्या आज भी एक सपने को जी रही है। सपना राम मंदिर का तो है ही अयोध्या के विकास का भी... और तो और अयोध्या के एक खास इलाके के सांसत व बंदिशों में होने का भी है।

लगभग ढाई दशक पूर्व तक अयोध्या का रामकोट मोहल्ला इस धर्मनगरी की धार्मिक व आध्यात्मिकता का नाभि केंद्र रहा। रामकोट क्षेत्र ही है जिसमें रामलला का विवादित गर्भगृह स्थित है।
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इस क्षेत्र में दर्जन ऐसे मंदिर थे जिनकी आध्यात्मिक आभा श्रद्धालुओं को बरबस खींच लाती थी। आज सारे के सारे मंदिर वीरान जैसे हैं। कुछ में अधिग्रहण हो जाने के कारण पूजा-पाठ भी बंद हो गए।

...आखिर कब मिलेगी रामलला को इससे मुक्ति

राम मंदिर के लिए रखे पत्‍थर - फोटो : amar ujala
पहले बाहर से अयोध्या आने वाले श्रद्धालु के लिए दर्शन के मुख्य केंद्र रामकोट क्षेत्र के यह मंदिर हुआ करते थे। अब हालत यह है कि रामकोट स्थित मानस भवन, रंगमहल, रामजन्म स्थान, राम खजाना, रामनिवास मंदिर, कैकेयी कोप भवन, सीता रसोई, लवकुश मंदिर, आनंद भवन, श्रंगार भवन, अमावां मंदिर, रामकृष्ण मंदिर, रंग जी का मंदिर आदि हैं, जो वीरानी का दंश झेल रहे हैं।

इन मंदिरों तक पहुंचने के लिए विवादित परिसर की सुरक्षा व अधिग्रहण के नाम पर इतनी बाड़, बैरीकेडिंग है कि सामान्य दिनों में श्रद्धालु उधर रुख करने की हिम्मत नहीं कर पाते।

राम जन्मभूमि पर विराजमान रामलला का दर्शन करने को जाइए तो लोहे के सुरक्षा जालों से घिरे गर्भगृह में विराजमान रामलला का दर्शन करने के साथ ही जे़हन में सवाल पैदा होता है कि आखिर उनको इससे मुक्ति कब मिलेगी।

तेजी से बदल रहा है नजारा

इसी अयोध्या का दूसरा इलाका रामघाट है, ढाई दशक पूर्व यह इलाका जंगल, बाग-बगीचे व खेत खलिहानों से अटा पड़ा था। अब यहां भी कंकरीट के जंगल तेजी से फैलने लगे हैं।

दरअसल राम मंदिर आंदोलन के शुरूआती दौर में ही इस रामघाट के इलाके में ही श्रीराम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिंदू परिषद ने अपने पांव रखे थे।

इसी रामघाट इलाके में राम मंदिर की पत्थर तराशी की दो कार्यशालाएं खोल दी गई और राम मंदिर आंदोलन की गतिविधियों का केंद्र कारसेवकपुरम बनाया गया। अब यह इलाका भी अयोध्या के दर्शनार्थियों के लिए एक उत्सुकता का केंद्र बन कर रह गया है।

राम जन्मभूमि न्यास की कार्यशाला में प्रस्तावित राम  मंदिर के लिए लगभग सवा लाख घन फिट पत्थर तराश कर बड़े परिसर में रखे गए हैं। अब इन पर काई जम गई है। सत्ता में हाशिए पर रहे लोग इसी अयोध्या को सीढ़ी बनाकर सत्तासीन हो गए, लेकिन अयोध्या ढाई दशक पहले जहां थी वहीं ठहरी पड़ी है, उदास, बेबस जैसी।
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आखिर अयोध्या सोचती क्या है?

यहां के प्रसिद्ध तंत्र साधक मंत्र मर्मज्ञ कालिकुलालयम पीठ के डा. रामानंद शुक्ल तपाक से बोल पड़ते हैं कि ‘‘बहुत मुश्किल है कि हालात की गुत्थी सुलझे, अहले दानिश ने बहुत सोच के उलझाई है’’ श्री शुक्ल कहते हैं कि राम मंदिर तो एक बड़ा सवाल है ही साथ ही अयोध्या का विकास भी एक अहम पक्ष है, जो अभी तक नजरंदाज है।

वह कहते हैं कि अयोध्या के विकास के दो पहलू मूल रूप से हैं, पहला भौतिक व दूसरा आध्यात्मिक। दोनों ही राह पर अयोध्या ठहरी दिखती है। अयोध्या में थोड़ा बहुत विकास जो हुआ भी है वह कच्छप गति से, जिसका कोई खास मतलब नहीं है।

शैक्षणिक व पर्यटन की दृष्टि से, चिकित्सा व आवागमन की दृष्टि से, बाहरी यात्रियों के ठहराव की सुविधा आदि मामलों में अयोध्या अभी अभिशप्त ही है। होना तो बहुत कुछ चाहिए।
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