सरकार चाहे नेताजी की हो या बहनजी की या फिर बाबूजी की, अफसरों की हनक देश-काल-परिस्थिति की मोहताज नहीं है।
बाबूजी की सरकार में उनका सिक्का चलता था। बहनजी की सरकार में तूती बोलती थी। नेताजी से भी लायजनिंग ठीक ही थी लेकिन अखिलेश भैया की सरकार ने उन्हें साइडलाइन कर दिया।
पार्टी के नेता-कार्यकर्ता नाराज न हो जाएं, इसलिए लगभग दो साल तक उन्हें मुख्य धारा से अलग रखा गया, लेकिन अब उनके दिन फिर गए हैं।
सरकार उन्हें मुख्य धारा में ले आई है। महकमा भी ऐसा सौंपा जिस पर सरकार की छवि को निखारने की जिम्मेदारी है।
अब लोकसभा चुनाव में मीडिया मैनेजमेंट में ये जनाब कितना जौहर दिखाते हैं यह तो वक्त ही बताएगा।