विधेयक के प्रावधानों के अनुसार गंभीर अपराध जैसे विधि विरुद्घ क्रियाकलाप निवारण अधिनियम 1967, एनडीपीएस एक्ट 1985, शासकीय गुप्त बात अधिनियम 1923, गैंगेस्टर और समाज विरोधी क्रिया कलाप अधिनियम 1986 के साथ ऐसे अपराध जिसमें मृत्युदंड तक का प्रावधान है, ऐसे मामलों में अभियुक्त को अग्रिम जमानत नहीं दी जा सकेगी।
विधेयक में यह प्रावधान भी किया गया है कि न्यायालय अग्रिम जमानत के लिए विचार करते समय मामले की प्रकृति और गंभीरता के साथ आवेदक का पूर्व इतिहास, न्याय से भागने की संभावना और उसे अपमानित करने के उद्देश्य से लगाए गए अभियोग जैसे बिंदुओं पर विचार कर सकती है।
अग्रिम जमानत की अंतिम सुनवाई के समय न्यायालय द्वारा लोक अभियोजक को सुनवाई के लिए नियत तिथि के कम से कम सात दिन पूर्व नोटिस भेजे जाने का प्रावधान किया गया है। साथ ही अग्रिम जमानत के संबंध में आवेदन पत्र का निस्तारण आवेदन किए जाने की तिथि से 30 दिन के अंदर अंतिम रूप से निस्तारित किए जाने का प्रावधान है।
इसके अलावा दंड संहिता की धारा 438 में अग्रिम जमानत के लिए दी गई व्यवस्था पर पुनर्विचार करने केलिए प्रमुख सचिव गृह की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है। इसी समिति ने धारा 438 दंड प्रक्रिया संहिता को संशोधित करने केलिए प्रस्ताव किया था।
बता दें कि इमरजेंसी के दौरान कांग्रेस सरकार ने इस अग्रिम जमानत की व्यवस्था समाप्त कर दी थी। इस मामले में अन्य राज्यों ने अपने अपने यहां इस कानून में संशोधन कर दिया था, केवल उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में ही इसमें संशोधन नहीं किया गया था। वर्ष 2010 में मायावती सरकार ने इस में संशोधन किया था, लेकिन राष्ट्रपति के यहां से इसे मंजूरी नहीं मिल पाई थी और कुछ आपत्तियों के साथ इसे वापस प्रदेश सरकार को भेज दिया गया था। पिछले जुलाई माह में राज्य सरकार ने इस संशोधन विधेयक को विधानमंडल में लाने की बात कही थी।
प्रमुख सचिव गृह अरविंद कुमार ने बताया कि इस नई व्यवस्था का लाभ अभियुक्त नहीं उठा सकेंगे। कुछ मामलों में कोर्ट के विवेक पर निर्णय छोड़ा गया है, जो यह फैसला करेगा कि अभियुक्त को अग्रिम जमानत देनी है या नहीं। यदि कोई अभियुक्त अग्रिम जमानत के लिए सीधे न्यायालय में पहुंचता है तो न्यायालय उसे अग्रिम जमानत तो दे देगी, लेकिन 30 दिन के अंदर उसे सरकार को भी सुनना होगा। यह व्यवस्था समिति ने पश्चिम बंगाल में इसे लेकर बनाए गए कानून से अंगीकृत की है। अरविंद कुमार ने बताया कि इस विधेयक को लाने से पहले इसका पूरा अध्ययन किया गया जिसके बाद इसे विधामंडल में लाने के प्रस्ताव को हरी झंडी दी गई है।