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यूपी में क्यों नहीं मिलती लालू, 'ललिता' जैसी सजा?

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आय से अधिक संपत्ति के मामले में तमिलानाडु की मुख्यमंत्री  को चार साल की सजा हो गई। उन पर 100 करोड़ रुपये का जुर्माना भी हुआ है।
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बिहार के चारा घोटाले में दो पूर्व मुख्यमंत्रियों लालू यादव और जगन्नाथ मिश्र को भी सजा सुनाई जा चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी पिछले कुछ वर्षों में राजनेताओं पर शिकंजा कसना शुरू हुआ है, पर इक्का-दुक्का मामले में ही सजा सुनाई जा सकी है।

यह स्थिति तब है कि जब यूपी में एक के बाद एक भ्रष्टाचार के कई मामले सामने आते रहे हैं। पर क्या हैं इसकी वजहें, जो हमें अक्सर शर्मसार कर देती हैं। शायद यही वजहें हैं कि दूसरे प्रदेशों में यूपी और यूपी वाले बदनाम माने जाते हैं। आगे पढ़िए, कैसे यहां होता है करप्शन और किस घोटालेबाज नेता को कितनी सजा मिल जाती है।
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होते रहे एक से बढ़कर एक घोटाले

रशीद मसूद के अलावा पूर्व कैबिनेट मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा, रंगनाथ मिश्र, पूर्व राज्यमंत्री चंद्रदेव राम यादव, बादशाह सिंह, विधायक रामप्रसाद जायसवाल की भ्रष्टाचार के मामलों में गिरफ्तारी हुई।

प्रदीप शुक्ल, रामबोध मौर्य, एसएन दुबे जैसे कुछ नौकरशाह भी जेल की सलाखों के पीछे पहुंचे हैं। प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव एपी सिंह व नीरा यादव को भी जेल जाना पड़ा, पर यूपी की घटनाओं को देखते हुए ऐसे उदाहरण अंगुलियों पर गिनने लायक ही हैं।

अनाज घोटाला हो या एनआरएचएम घोटाला, मनरेगा में गड़बड़ी हो या लैकफेड घोटाला, पुलिस भर्ती में गड़बड़ी, आयुर्वेद घोटाला, ताज कॉरिडोर जैसे मामलों में कार्रवाई तब आगे बढ़ी जब न्यायालय का डंडा चला। हालांकि न्यायालय के निर्देश के बावजूद जांच प्रक्रिया को खींचने के प्रयास किए गए।

सपा ने भी किया 'शर्मनाक' काम

पहले बसपा और फिर सपा ने सत्ता में आने के लिए भ्रष्टाचार को मुद्दा तो बनाया, पर सरकार में आने के बाद धार कुंद हो गई। उदाहरण के लिए दिवंगत हो चुके एक शराब माफिया का नाम सूबे के पंजीरी घोटाला में आया था।

शराब घोटाले में भी इन पर खूब आरोप लगे। समाजवादी पार्टी इसे सबक सिखाने का ऐलान कर रही थी। पर, सपा सत्ता में आई तो शराब की लॉटरी फिर उक्त माफिया की फर्म के नाम खुली। सभी मामले सियासी दखल की भेंट चढ़ गए।

ये किसी और की नहीं, बल्कि एक बड़ शराब व्यापारी की कंपनी थी, जिसे माया राज में वरदहस्त की प्राप्ति थी। इसके बाद, इनके एक पारिवारिक विवाद में ही इनकी हत्या कर दी गई।

मायावती ने की जमकर मनमानी

लोकायुक्त एनके मेहरोत्रा ने मायावती सरकार में एक दर्जन मंत्रियों के खिलाफ जांच कर कार्रवाई की सिफारिश के साथ रिपोर्ट सरकार को भेजी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने इनमें से कुछ को मंत्रिमंडल से हटा तो दिया, पर आपराधिक मामलों की जांच कराने और कार्रवाई की अनुमति नहीं दी।

इनमें तत्कालीन मंत्री राजेश त्रिपाठी, अवध पाल सिंह यादव, रंगनाथ मिश्र, बादशाह सिंह, रतन लाल अहिरवार, चंद्रदेव राम यादव, फतेह बहादुर सिंह, सदल प्रसाद, राकेश धर त्रिपाठी, अयोध्या प्रसाद पाल, रामवीर उपाध्याय, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबूसिंह कुशवाहा, राम अचल राजभर आदि शामिल थे।

नसीमुद्दीन के खिलाफ तो लोकायूुक्त की जांच रिपोर्ट को भी मायावती ने स्वीकार नहीं किया। सपा सरकार आने के बाद लोकायुक्त ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को नसीमुद्दीन, रामवीर उपाध्याय, अयोध्या प्रसाद पाल, राम अचल राजभर की जांच रिपोर्ट फिर भेजी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

आखिरकार राजभवन से गुहार

आखिरकार लोकायुक्त को इन मामलों में कार्रवाई को अंजाम तक पहुंचाने के लिए राज्यपाल राम नाईक से गुहार लगानी पड़ी है। राज्यपाल ने गंभीर रुख अख्तियार करते हुए मुख्यमंत्री से पूछा है कि पूर्व मंत्री अवधपाल सिंह, रामवीर उपाध्याय, बादशाह सिंह, राजेश त्रिपाठी व राम अचल राजभर के खिलाफ लोकायुक्त की जांच रिपोर्ट पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है। राज्यपाल के हस्तक्षेप के बाद इन नेताओं के खिलाफ जांच में सक्रियता दिख रही है, पर अभी यह नहीं कहा जा सकता कि कार्रवाई में कितना समय लगेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस खेमकरण कहते हैं कि जिन्हें खास लोग कहा जाता है, उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों में सरकारी मशीनरी का मूवमेंट आम आदमी की तरह तेज नहीं होता। इनके खिलाफ इंवेस्टीगेशन और अभियोजन से लेकर ट्रायल तक में देरी की जाती है। प्रभावी लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल करके केस को लंबा खींचते हैं। हालांकि अदालतों पर मुकदमों का बोझ भी मामलों के लंबा खिंचने की एक वजह है।
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भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई का हाल (1)

•35 से अधिक जिलों में हुए अनाज घोटाले की नौ साल से जांच ही चल रही है। कुछ गिरफ्तारियां जरूर हुईं, पर बड़े चेहरे अभी तक जांच की जद में ही नहीं आ पाए हैं।
•मनरेगा घोटाला की जांच चल रही है। कुछ अधिकारियों की गिरफ्तारी जरूर हुई है, पर घोटाले को लेकर चर्चा में आए कुछ राजनेताओं पर अभी तक शिकंजा नहीं कस पाया है।
•एनआरएचएम घोटाले में बाबूसिंह कुशवाहा और तत्कालीन विधायक रामप्रसाद जायसवाल जेल में हैं। इसमें भी किसी बड़े नेता पर शिकंजा नहीं कस पाया है।
•लैकफेड घोटाले में बसपा सरकार के कई मंत्री कठघरे में हैं। हालांकि कई प्रभावशाली राजनेताओं पर अभी तक हाथ नहीं डाला जा सका है।
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भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई का हाल (2)

•ताज कॉरिडोर प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के निर्देश दिए तो 25 अगस्त 2003 को मायावती ने मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। तत्कालीन पूर्व मुख्य सचिव डीएस बग्गा, तत्कालीन पर्यावरण सचिव वीके गुप्ता व आरके शर्मा निलंबित हुए। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने सीबीआई की जांच के आधार पर मुकदमा चलाने के लिए पर्याप्त तथ्य न होने की बात कहते हुए इस मामले को खारिज कर दिया। अब एक नई याचिका पर सर्वोच्च न्यायालय ने मायावती से जवाब मांगा है।
•मुलायम सिंह यादव पर भी आय से अधिक संपत्ति को लेकर छींटे पड़े। सीबीआई ने सितंबर 2013 में अदालत में शपथ पत्र दाखिल कर सपा मुखिया व उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ पर्याप्त सुबूत न होने का तर्क देकर केस बंद करने की अनुमति मांगी। फरवरी 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया कि सतर्कता आयुक्त के परीक्षण के बिना सीबीआई प्रारंभिक जांच बंद नहीं कर सकती।
•मुलायम के पहले मुख्यमंत्रित्व काल में आयुर्वेदिक दवाओं की खरीद में हेराफेरी में करीब 32 करोड़ रुपये का गड़बड़झाला सामने आया। आरोप की जद में तत्कालीन आयुर्वेद निदेशक डॉ. शिवराज सिंह, उस समय सपा नेताओं के करीब माने जाने वाले दवा कारोबारी दुर्गेश सक्सेना, तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री बलराम यादव पर आरोप लगे। बलराम यादव को मंत्री पद से इस्तीफा तक देना पड़ा था, पर बड़े चेहरे कार्रवाई की जद से दूर ही रहे।
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