सनी को अपने परिजनों की गलती का खामियाजा भुगतना पड़ा और शुभाशीष को अपनी बेवकूफी का, लेकिन ये सिर्फ दो ही मामले नहीं हैं।
ऐसे दर्जनों मामले आए दिन संजय गांधी पीजीआई के पीडियाट्रिक गैस्ट्रोइंट्रोलॉजी विभाग में पहुंच रहे हैं।
विभाग के हेड प्रो. एसके याचा के अनुसार बीते एक माह के अंदर ही उनके विभाग में 17 ऐसे बच्चे इलाज के लिए पहुंचे थे, जिन्होंने एसिड पी लिया था।
इसके चलते उनकी आहार नाल जलकर सिकुड़ गई थी। पेट में अल्सर हो गए थे। इसके चलते खाना तो दूर पानी पीना भी मुश्किल हो चुका था।
इलाज के बावजूद खाना-पीना न मिलने के कारण वे लगातार कमजोर होते जा रहे थे।
प्रो. याचा ने बताया कि एसिड, टॉयलेट क्लीनर, कास्टिक सोडा या फिर गोल्ड की सफाई में इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोक्लोरिक एसिड पीने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
उन्होंने बताया कि एसिड पीने से सबसे पहले मुंह को नुकसान पहुंचता है। इसके बाद सबसे संवेदनशील आंतरिक अंग आहार नाल (फूड पाइप), उसके बाद पेट और आंत को जोड़ने वाले वाल्व के पास का हिस्सा प्रभावित होता है।
उन्होंने बताया कि विभिन्न अस्पतालों में तीन से चार सप्ताह के इलाज के बाद ऐसे बच्चे उनके विभाग में इलाज के लिए पहुंच रहे हैं।
क्योंकि इलाज के बावजूद तीन सप्ताह में खाने की नली सिकुड़ने लगती है। या फिर नली सही रही तो पेट से आंतों को जोड़ने वाला हिस्सा सिकुड़कर बंद हो जाता है।
इससे पानी तक आगे नहीं बढ़ पाता और बच्चा पोषण न मिलने के कारण कमजोर होता चला जाता है। कुछ बच्चों में तो नली को निकालना पड़ता है या फिर पेट को ही निकालना पड़ जाता है।
जिनका आहार नाल और पेट दोनों ही खराब हो जाता है, उनमें आंत को ऊपर तक जोड़ना पड़ता है। प्रो. याचा ने बताया कि कुछ बच्चों में इंडोस्कोपी से सिकुड़न को ठीक कर धीरे-धीरे रास्ता बनाया जाता है। दोनों ही प्रक्रिया के दौरान बच्चों की जान पर बनी रहती है।
चार साल के सनी ने घर में फ्रूटी की बोतल रखी देखी। उसने बोतल उठाई, ढक्कन खोला और बोतल मुंह से लगा ली। पहला घूंट जाते ही सनी चीखने लगा।
परिवार वाले भी भागे, देखा की उसने कुछ ऐसा पी लिया था जिससे उसका मुंह जल गया था। परिजनों ने फ्रूटी की बोतल उठाई तो पता चला कि उसमें टॉयलेट क्लीनर (एसिड) रखा था।
महीनों इलाज के बाद भी उसे एसिड पीने के कारण हुए जख्मों से राहत मिल पाई।