एचआईवी संक्रमित मां से जन्म लेने वाले बच्चे दुनिया में आंखें खोलने से पहले ही एचआईवी पॉजिटिव होते हैं, लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।
यूपी स्टेट एड्स कंट्रोल सोसाइटी (यूपीसैक्स) ने अब सभी अस्पतालों को संक्रमित मां से पैदा होने वाले बच्चे के जन्म से पहले ही ट्रीटमेंट शुरू करने की पहल की है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इससे 95-98 प्रतिशत बच्चों को एचआईवी संक्रमण से बचा लिया जाएगा। यूपीसैक्स ने लखनऊ सहित पूरे राज्य में पहली बार एचआईवी संक्रमित गर्भवती के लिए यह खास एआरटी शुरू की है।
इस तरह होगा इलाज
संयुक्त सचिव यूपीसैक्स डॉ. मनु भटनागर ने बताया कि गर्भ ठहरने का पता चलते ही इस एआरटी को शुरू कर दिया जाएगा।
गर्भ ठहरने के समय इस एआरटी में टेनोफॉविर लैमीव्यूडाइन इसावाइरेंज (टीएलई) सहित तीन दवाओं के कॉम्बिनेशन को दिया जाएगा।
इससे बच्चे में एचआईवी के खतरे को बहुत हद तक कम किया जा सकेगा। इससे पूर्व बच्चे के जन्म से पहले एक बार मां को नाइवरैपिन की टेबलेट दी जाती थी।
जन्म के बाद बच्चे को भी नाइवरैपिन सीरप दिया जाता था। इसके साथ ही उसे निगरानी में रखा जाता था।
पूरे राज्य में लागू होगा
डिपार्टमेंट ऑफ एड्स कंट्रोल (डैक, पूर्ववर्ती नैको) की रीजनल कोऑर्डिनेटर डॉ. अर्चना गुप्ता ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने सितंबर 2013 में ट्रीटमेंट प्रोटोकॉल जारी किया था।
एचआईवी का संक्रमण मां से बच्चे में होने की आशंका को देखते हुए इसे एक जनवरी 2014 को डैक ने अपनाया। अब यूपीसैक्स भी इसे पूरे राज्य में एक साथ लागू करने जा रहा है।
इसके लिए जरूरी प्रशिक्षण भी शुरू किया जा चुका है। यह इलाज सभी एआरटी और पीपीटीसीटी केंद्रों पर उपलब्ध होगा।
संक्रमण से बचेंगे 95 प्रतिशत बच्चे
यूपीसैक्स के एडिशनल प्रोजेक्ट डायरेक्टर नरेंद्र कुमार ने बताया कि अब तक की ट्रीटमेंट सिस्टम की वजह से 35-40 प्रतिशत बच्चों को ही संक्रमण से बचाया जाता था।
अब हम औसतन 95 प्रतिशत तक बच्चों को संक्रमित होने से बचा सकेंगे। इस साल इस प्रोग्राम को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने के लिए 100 नए पीपीटीसीटी केंद्र खोले जा रहे हैं।
माइग्रेशन बड़ी समस्या
डॉ. भटनागर ने बताया कि संक्रमण फैलने की बड़ी वजह माइग्रेशन है। काम की तलाश में बाहर जाने वाले पति एचआईवी के साथ वापस लौटते हैं। इसके बाद पत्नी को भी यह संक्रमण हो जाता है।
संक्रमित होने के बाद भी प्रेगनेंसी एक से ज्यादा बार तक होती है। ऐसे में बच्चे को संक्रमित होने से बचाना जरूरी हो जाता है।