फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Lucknow News: सौ साल का हुआ चारबाग स्टेशन, आहिस्ता-आहिस्ता बन रहा आधुनिक

विज्ञापन
चारबाग रेलवे स्टेशन।
विज्ञापन
लखनऊ। चारबाग रेलवे स्टेशन ने अपनी स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस उपलक्ष्य में रविवार को स्टेशन के एसी लाउंज में डीआरएम सुनील कुमार वर्मा, सीनियर डीसीएम कुलदीप तिवारी ने टेबल बुक का विमोचन किया। यह स्टेशन लखनऊ की कई महत्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी बना है।
विज्ञापन

रेलवे अधिकारी बताते हैं कि चारबाग स्टेशन की नींव 21 मार्च, 1914 को बिशप जॉर्ज हर्बर्ट ने रखी थी। उस वक्त की इमारत अब पार्सल घर के तौर पर इस्तेमाल हो रही है। इसके साथ ही स्टेशन की मुख्य इमारत का भी निर्माण करवाया गया था, जिसका काम अगस्त, 1925 में पूरा हुआ था। इतना ही नहीं, अंग्रेज नया काम करते वक्त बिल्डिंग की नींव में उस दिन के अखबार व सोने के सिक्के डालते थे।
फौज के लिए सामान पहुंचाने के लिए बना था स्टेशन
यहां दीवार पर ईस्ट इंडियन रेलवे के जीएल कॉल्विन, तत्कालीन एक्सईएन आरई मैरियट, कॉन्ट्रैक्टर जेसी बनर्जी और ऑर्किटेक्ट जेएच हॉर्निमैन का भी नाम दर्ज है। अंग्रेजों ने अप्रैल, 1867 में लखनऊ-कानपुर रेलखंड संचालन के लिए खोला था। चूंकि, उस समय छावनी में अंग्रेजी हुकूमत डेरा डाल चुकी थी। ऐसे में फौज के लिए रसद और अन्य जरूरी सामान पहुंचाने के लिए चारबाग रेलवे स्टेशन बनवाया, जो वर्तमान में क्लॉक रूम तक सीमित था। उस वक्त यहां पर केवल सिंगल लाइन थी। यहां रात 11 बजे के बाद अंग्रेजी फौज आती थी।
विज्ञापन

खूबियां : बाहर नहीं जाती ट्रेन की आवाज
स्टेशन अवधी व यूरोपीय वास्तुकला का अद्भुत नमूना है। इसकी एक खासियत यह भी है कि चाहे जितने शोरशराबे के साथ ट्रेन प्लेटफॉर्म पर आए, उसकी आवाज स्टेशन के बाहर नहीं जाती।
यहीं हुई थी गांधी-नेहरू की पहली मुलाकात
देश के पहले पीएम पंडित जवाहर लाल नेहरू की बापू से पहली मुलाकात लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर ही हुई थी। महात्मा गांधी 26 दिसंबर, 1916 को पहली बार लखनऊ आए थे। मौका था कांग्रेस के अधिवेशन का। इस दौरान वह पांच दिनों तक शहर में रहे। तकरीबन 20 मिनट की मुलाकात में पंडित जी बापू के विचारों से काफी प्रभावित हुए। जवाहर लाल नेहरू अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ आए थे। इस मुलाकात का जिक्र नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। जिस जगह पर गांधी-नेहरू की मुलाकात हुई, वहां अब स्टेशन की पार्किंग है। इस मिलन की निशानी के तौर पर उस जगह पर एक पत्थर भी लगा है।

पुराना मापक यंत्र और 60 किलो का घंटा
चारबाग स्टेशन की इमारत पर आधा दर्जन टंकियां हैं। प्रत्येक की क्षमता 30-30 हजार लीटर की है। टंकियों में पानी मापने के लिए अब नए मापक स्थापित हो गए हैं, पर स्टेशन निदेशक के कमरे के पास लगा पुराना मापक यंत्र आज भी स्थापित है। स्टेशन पर 1949 में 60 किलो का एक घंटा (अलार्म) भी लगवाया गया था।
खास बातें -
-चारबाग स्टेशन आसमान से देखने पर शतरंज की बिसात सा नजर आता है।
-उस दौर के प्रसिद्ध वास्तुकार जैकब ने इस इमारत का नक्शा तैयार किया। स्टेशन बनने में उस वक्त 70 लाख रुपये खर्च हुए।
-नवाब आसफुद्दौला के पसंदीदा बाग ऐशबाग की तरह चारबाग भी शहर के खूबसूरत बागों में से एक था। किसी चौपड़ की तरह चार नहरें बिछाकर चार कोनों पर चारबाग बनवाए गए थे। इस तरह के बागों को फारसी जबान में चहार बाग कहा जाता है। यही चहार बाग बाद में चारबाग में तब्दील हो गया और रेलवे स्टेशन इस इलाके के साथ पूरे लखनऊ की पहचान बन गया।

चारबाग रेलवे स्टेशन।

चारबाग रेलवे स्टेशन।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें