डॉ. बृजेश कुमार सिंह
अयोध्या। गंगा की प्रमुख सहायक नदी घाघरा (सरयू) की धारा में बदलाव हो रहा है। इसमें वर्ष 1975 से 2022 के दौरान बड़े आकारिकी-गतिक परिवर्तन (मार्फो-डायनमिक चेंज) हुए हैं। इसका खुलासा डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के शोध अध्ययन में हुआ है। इस अवधि में नदी के तटों का विस्थापन आठ किलोमीटर तक दर्ज किया गया है। यह परिवर्तन कृषि भूमि, बस्तियों और आधारभूत संरचनाओं के लिए गंभीर चुनौतियां पैदा कर सकते हैं।
यह शोध अध्ययन घाघरा नदी के बहराइच से टांडा तक के मध्यवर्ती प्रवाह क्षेत्र पर केंद्रित रहा। शोधकर्ता अवध विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. विनोद कुमार चौधरी ने नदी के आकार और गति व्यवहार का विश्लेषण किया। इसके लिए दूरसंवेदी तकनीकों और भौगोलिक सूचना तंत्र का उपयोग किया गया। अध्ययन में 1975 से 2022 तक के बहु-कालिक लैंडसैट उपग्रह चित्रों का विश्लेषण किया गया। इसके विश्लेषण से पता चला कि नदी के बाएं तट का विस्थापन 3.12 से 4.22 किलोमीटर के बीच रहा। वहीं, दाएं तट का विस्थापन 3.37 से 7.91 किलोमीटर तक दर्ज किया गया। यह परिवर्तन विभिन्न जलवैज्ञानिक परिस्थितियों के प्रभाव में होने वाले कटाव व जमाव को दर्शाता है। रुदौली–गोसाईंगंज खंड में नदी की सर्वाधिक अस्थिरता दर्ज की गई।
रुदौली–गोसाईंगंज खंड में सबसे ज्यादा कटाव
अध्ययन में कर्नलगंज–रुदौली और रुदौली–गोसाईंगंज खंडों में ज्यादा कटाव पाया गया। पता चला कि रुदौली–गोसाईंगंज खंड में सक्रिय विसर्प (नदी के घुमाव) विस्तार, तट कटाव और जमाव प्रमुख भू-आकृतिक प्रक्रियाएं हैं। अध्ययन में विभिन्न नदी खंडों में साइनुओसिटी (बलखाते चलना) सूचकांक 1.07 से 1.37 के मध्य पाया गया। यह मध्यम से उच्च वक्रता प्रवृत्ति को दर्शाता है। सर्वाधिक मान 1990 से 2020 की अवधि के दौरान दर्ज किए गए। नदी चैनल की लंबाई में परिवर्तन भी विसर्पों (नदी के घुमाव) के क्रमिक विकास का संकेत देता है।
कोट
अध्ययन के परिणाम दर्शाते हैं कि घाघरा नदी का आकारिकी विकास कई कारकों के संयुक्त प्रभाव से नियंत्रित होता है। इनमें प्राकृतिक जलप्रवाह, तलछट आपूर्ति और तटीय कटाव व जमाव की प्रक्रियाएं शामिल हैं। मानसूनी प्रवाह भी नदी के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसके अतिरिक्त, मानवीय हस्तक्षेप नदी के विकास में भूमिका निभाता है। तटों के कटाव से उपजाऊ जमीन का नुकसान होता है। नदी के किनारे बसी बस्तियों और गांवों को भी विस्थापन का खतरा उत्पन्न हो सकता है। इन चुनौतियों का समाधान आवश्यक है। - डॉ. विनोद कुमार चौधरी, अध्यक्ष-पर्यावरण विज्ञान विभाग, अवध विश्वविद्यालय