लखनऊ। इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आयोजित जश्न-ए-अदब साहित्योत्सव के दूसरे दिन गीत, संगीत, गजल, बैंतबाजी, बांसुरी वादन, लोकगीत और शायरी की महफिल सजी। इस दौरान शेरी नशस्ति में शायर फरहत एहसास, हास्य-व्यंग्य कवि अशोक चक्रधर और मदन मोहन दानिश ने खूब वाहवाही लूटी। पं. साजन मिश्र और लोकगायिका मालिनी अवस्थी की प्रस्तुतियों ने मन मोहा तो बांसुरी वादक पं. हरिप्रसाद चौरसिया की प्रस्तुति ने भी श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
दूसरे दिन की शुरुआत बैंतबाजी से हुई। इसमें चार टीमों ने भाग लिया। शायरी का यह मुकाबला बेहद रोचक रहा, जिसमें कहकशां, दरख्शा और मो. युसुफ आरिफ की टीम पहले स्थान पर रही। उम्मे हिलाल, मुसफिरा और यासमीन की टीम दूसरे और अब्दुर्रहमान, मो. नोमान और मो. नाज की टीम तीसरे स्थान पर रही। जश्न-ए-अदब कल्चरल कारवां के संस्थापक कुंवर रंजीत चौहान ने कहा कि हमारा उद्देश्य केवल हमारी साहित्य-संस्कृति को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि उसे आने वाली पीढि़यों तक पहुंचाना है।
पहले तुम्हें दुखांत लगेगा नाटक मगर सुखांत मेरा...
शेरी नशिस्त की शुरुआत करते हुए नितिन कबीर ने पढ़ा- बाहर उनके निकला हूं कई सालों में, वो जो दो गड्ढे थे उसके गालों में...। इमरान राही ने पढ़ा- वो लड़की आई है जबसे ख्वाबों में मेरे, मेरी आंखों की बोली लग रही है...। जावेद मुशीरी ने सुनाया - लाज रखी न गई कान से सरगोशी की, इन्तिहा हो गई अहसान फरामोशी की...। शायर मदन मोहन दानिश ने पढ़ा- बात इतनी समझ में आई है, हर कहानी सुनी सुनाई है। फरहत एहसास ने अपने अंदाज में जब पढ़ा, कितने बेदर्द होते जा रहे हैं, आप तो मर्द होते जा रहे हैं... तो हॉल तालियों से गूंज उठा। सदारत कर रहे देश के वरिष्ठ कवि अशोक चक्रधर ने अपनी रचनाओं से श्रोताओं के मन को छुआ। उन्होंने पढ़ा- कविता में नाटक हो चाहे नाटक ही में कविता हो, पहले तुम्हें दुखांत लगेगा नाटक मगर सुखांत मेरा...। कुंवर रंजीत चौहान से सुनाया- देखे हुए से ख्वाब सा एक ख्वाब देखना, फिर ख्वाब में ख्वाब के जैसा तलाशना। इसके अलावा आलोक अविरल, रंजन निगम आदि ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं।
पहले जैसा नहीं रहा लखनऊ, पर बाकियों से आज भी अच्छा
लखनऊ। मशहूर शायर फरहत एहसास लंबे समय से लखनऊ आते रहे हैं। कल्चरल कारवां के मुशायरे में शामिल होने आए फरहत एहसास ने अमर उजाला से खास बातचीत में कहा कि अब लखनऊ पहले जैसा तो नहीं रहा, लेकिन बाकियों से आज भी अच्छा है। एक जमाने में यहां की जबान में मिठास हुआ करती थी। उर्दू, अवधी और ब्रज भाषा का मिश्रण सुनने को मिलता था। दिल्ली के मुकाबले लखनऊ की बोली बहुत नर्म थी। हालांकि, अब पहले जैसी नरमी नहीं रही। कहा, 1782 में दिल्ली छोड़कर मशहूर शायर मीर तकी मीर भी लखनऊ ही आ गए थे। यह लखनऊ की तहजीब के प्रति उनका आकर्षण ही था।
सूफियाना अंदाज ने जीता दिल
भोपाल से आए सूफी गायक राजीव सिंह ने अपने गायन से श्रोताओं का दिल जीत लिया। रुदाली फिल्म के गीत दिल हूम हूूम करे... और नजीर अकबराबादी की गजल दुनिया में बादशाह है जो सो है वो भी आदमी... से वाहवाही लूटी। वहीं, नासिर काजमी की गजल गए दिनों का सुराग लेकर किधर से आया किधर गया वो... सुनाकर बंटवारे का दर्द बयां किया। पंजाबी गीत तेरे बिन नई लगदा दिल मेरा ढोलना... सुनाकर खूब झुमाया।
दिल जलाने की बात करते हो...
लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कल्चरल कारवां में अपनी गायिकी से श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। उन्होंने सुनाया- आशियाने की बात करते हो, दिल जलाने की बात करते हो... वादा फिर कर रहे हो बुलाने का, क्यों सताने की बात करते हो...। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियों से श्रोताओं को आनंदित किया।
बालम आए... पं. साजन मिश्र ने छेड़ा राग जोग
पद्मश्री पंडित साजन मिश्र ने राग जोग के साथ बालम आए... गीत पर जब अलाप लिया तो समूचा हॉल तालियों से गूंज उठा। उनके साथ स्वरांश मिश्र ने भी सुर साधे। हारमोनियम पर धर्मेंद्र मिश्र और तबले पर शुभ महाराज ने संगत की। सजन कोहसे कहूं अपने मन की बतिया... और साजन मोरे घर आए... से शास्त्रीय संगीत की रंगत बिखेरी। इस दौरान हनुमान चालीसा की प्रस्तुति पर भी खूब तालियां बजीं।