विदेशों में जमा कालेधन की जांच कर रही सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम (एआईटी) ने हालांकि, यादव सिंह प्रकरण की जांच सीबीआई को करने को कहा है, पर अभी तक इसके औपचारिक आदेश सीबीआई के पास नहीं पहुंच सके हैं। मामले की जांच सीबीआई से कराए जाने के पीछे सियासी मायने देखे जा रहे हैं। लिहाजा यह तय माना जा रहा है कि सीबीआई इस मामले की जांच हाथ में लेने में कोई देरी नहीं करेगी।
सूत्रों का कहना है कि अदालत के आदेशों का इंतजार कर रहे जांच एजेंसी के आला अफसरों ने इसे लेकर यह विचार किया हुआ है कि प्रकरण की जांच मुख्यालय के एंटी करप्शन फर्स्ट या सेकेंड शाखा से कराई जाए। सीबीआई की यह वह शाखा है जहां देश के सबसे महत्वपूर्ण मामलों की जांच की जाती है।
मंगलवार को एसआईटी ने यादव सिंह प्रकरण की जांच सीबीआई से कराए जाने को कहा था। इस अनुक्रम में सीबीआई के अफसर अपनी तैयारियों में जुट गए। सूत्र बताते हैं कि उच्च अफसरों में आपस में जांच को लेकर जो विमर्श हुआ, उसके लिहाज से सीबीआई यादव सिंह प्रकरण की जांच अपने हाथ में लेने को तैयार है।
सियासी मायने भी हैं जांच के पीछे
जांच लेने की दशा में पड़ताल की जिम्मेदारी सीबीआई मुख्यालय के एंटी करप्शन विंग को सौंपा जाना है। इस विंग के भी तीन सेक्शन हैं। एस- प्रथम, एसी- टू और एसी-थ्री। एसी- प्रथम में ताज कॉरीडॉर, कोल ब्लाक, स्पेक्ट्रम, डिफेंस, सेंट्रल डिपार्टमेंट्स के उच्च अधिकारियों, राज्यों के मंत्रियों के आदि के मामलों की जांच जाती है और फिर बाकी की दोनों विंग में इससे कम महत्व की जांच दी जाती है।
यादव सिंह प्रकरण की जांच के पीछे सियासी मायनों को भी देखा जा रहा है। सूत्रों के अनुसार इस केस को भी ताज कॉरीडॉर मामले की जांच की तरह ही लेना चाहिए। यादव सिंह प्रकरण में तत्कालीन मुख्यमंत्री समेत कई अन्य राजनीतिक हस्तियों तक आंच पहुंच सकती है। ऐसे में इस जांच को उत्तर प्रदेश में 2017 के विधान सभा चुनाव के नजरिए से काफी महत्व वाला माना जा रहा है।
अभी कोई आदेश नहीं मिला : प्रवक्ता
सीबीआई के प्रवक्ता आरके गौर का कहना है कि बुधवार देर शाम तक सीबीआई के पास जांच को लेकर कोई औपचारिक आदेश नहीं पहुंचा था। आदेश न आने की स्थिति में जांच को लेकर उच्च अधिकारी कोई फैसला नहीं कर सके थे। प्रवक्ता ने बताया कि इस बीच यह जानकारी की जा रही है कि किन हालात में एसआईटी ने सीबीआई जांच को कहा है और जांच किन बिंदुओं या आधार पर किए जाने को कहा गया है।
सीबीआई के पूर्व संयुक्त निदेशक (लीगल) एके श्रीवास्तव का कहना है कि केंद्र सरकार या केंद्र के विभागों के मामले तो सीबीआई स्वत: संज्ञान से भी जांच के लिए ले सकती है, लेकिन राज्यों के मामले की जांच के लिए तीन ही तरीके हैं। पहला तो राज्य सरकार इसकी सिफारिश करे, दूसरा उच्च अदालत निर्देश दे या तीसरा सर्वोच्च अदालत निर्देश दे।
राज्य सरकार द्वारा सिफारिश किए जाने की स्थिति में सीबीआई दिल्ली पुलिस एक्ट के सेक्शन फाइव-ए में कार्रवाई करती है। राज्य सरकार की सिफारिश पर गृह मंत्रालय द्वारा सीबीआई को मामला संदर्भित किया जाता है, जिस पर सीबीआई जांच के लिए सहमत होने की दशा में अपनी रिपोर्ट भेजती है। इस रिपोर्ट पर बाद में कार्मिक मंत्रालय द्वारा नोटीफिकेशन जारी किया जाता है।
श्रीवास्तव ने कहा कि जहां तक उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सीबीआई जांच के आदेश दिए जाने की बात है तो दोनों ही अदालत यह आदेश रिट् ज्यूरिसडिक्शन के तहत देती हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित एसआईटी द्वारा जांच के आदेश दिए जाने की बात है। कहा कि चूंकि एसआईटी यह आदेश रिट् ज्यूरिसडिक्शन के तहत नहीं दे सकती है, लिहाजा सीबीआई इसके विधिक पहलुओं पर विचार करने के बाद ही कोई फैसला करेगी।