सीबीआई की विशेष अदालत ने पीलीभीत फर्जी मुठभेड़ कांड में दोषी ठहराए गए सभी 47 पुलिसवालों को उम्रकैद की सजा सुनाई है।विशेष अदालत के जज लल्लू सिंह ने सोमवार को सभी हत्यारे पुलिसवालों को उनके पद के हिसाब से जुर्माना भी लगाया है।
इसके साथ ही इस फर्जी मुठभेड़ में मारे गए 11 सिखों के परिवारीजनों को 14-14 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश भी दिया है।
अदालत ने पुलिस के बड़े अफसरों की भूमिका पर सवाल उठाते हुए सख्त टिप्पणियां की हैं। साथ ही, सीबीआई की जांच में व्यवस्थागत दिक्कतों की वजह से ट्रायल से बच गए पुलिस के आला अफसरों पर दोबारा केस चलाने की ताकीद भी की है।
इस केस में 57 पुलिसवालों को आरोपी बनाया गया था। सुनवाई के दौरान इनमें 10 की मौत हो गई थी। बाकी बचे 47 पुलिसवालों को अदालत ने एक अप्रैल को अपहरण व हत्या का दोषी ठहराया था।
आजीवन कारावास सबको, जुर्माना पद के अनुसार
थानाध्यक्ष या थाना प्रभारी : 11 लाख रुपये
उपनिरीक्षक : 8 लाख रुपये
सिपाही : 2.45 लाख रुपये
फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने की तल्ख टिप्पणियां
जब तक एनकाउंटर से प्रमोशन होंगे तो निरीह लोग मरते रहेंगे
जब तक प्रमोशन का आधार एनकाउंटर बने रहेंगे, पुलिस वाले निरीह लोगों की हत्याएं करते रहेंगे। एनकाउंटर पर एसआई को इंस्पेक्टर बना दिया जाता है तो इंस्पेक्टर को डिप्टीएसपी। प्रमोशन का यही लालच पुलिसवालों को फर्जी एनकाउंटर के लिए प्रेरित करता है। इन्हें रोकने के लिए प्रमोशन को एनकाउंटर से अलग करना होगा।
बड़े अफसर निश्चित रूप से शामिल, सीबीआई ने जांच से बचाया
जिस तरह 11 सिख पुरुषों को तीन हिस्सों में बांटा गया, अलग-अलग क्षेत्रों में उनकी हत्या की गई, पूरे घटनाक्रम को मुठभेड़ में बदल दिया गया, यह साबित करने के लिए काफी है कि उन्हें जिला स्तर के वे महत्वपूर्ण अधिकारी निर्देश दे रहे थे जिनके पास काफी शक्तियां थीं। उन्हीं के निर्देश पर ये हत्याएं की गईं, लेकिन सीबीआई ने अपनी जांच से उन्हें दूर रखा।
ऊपर से मिले निर्देशों से बचाए ‘महत्वपूर्ण लोग’
सीबीआई के जांच अधिकारी जांच के दौरान पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होते। वे अपने उच्च अफसरों से लगातार सलाह और आवश्यक निर्देश लेते रहते हैं। ये निर्देश कई दफा ऐसे महत्वपूर्ण लोगों को आरोपी होने से बचाने के लिए होते हैं, जिन्हें वास्तव में अभियुक्त होना चाहिए। इस मामले में भी यही हुआ। सीबीआई अफसरों ने ऊपर से मिले निर्देशों के चलते ऐसे महत्वपूर्ण लोगों को बचाया जो अभियुक्त थे।
वरिष्ठ पुलिस अफसरों पर चलाया जा सकता है मुकदमा
मुकदमे के दौरान यह स्पष्ट हो चुका था कि दोषियों के अलावा पुलिस के कई उच्चाधिकारी भी षडयंत्र में शामिल थे। देश में कानून का राज है, लिहाजा किसी भी स्तर का अधिकारी अगर अपराध या उसका षड़यंत्र रचता है तो उसके खिलाफ भी मुकदमा चलना चाहिए। इस केस में पुलिस के जो उच्च अफसर शामिल थे, राज्य सरकार को उन पर नए सिरे से केस चलाने के लिए विचार करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा- मृत्युदंड तो बहुत कम पीड़ा में पूरी हो जाती
सीबीआई अभियोजक एससी जायसवाल ने सभी आरोपियों को मृत्युदंड देने की मांग की। तब कोर्ट ने कहा- मृत्युदंड वास्तव में बहुत छोटी सजा है, जो बहुत कम पीड़ा के साथ समाप्त हो जाती है। जबकि आजीवन कारावास को भोगने वाला व्यक्ति रोज मरता है।
दोषी पुलिसवालों ने कोर्ट में 4 घंटे किया बवाल
उम्रकैद की सजा सुनाए जाने पर उग्र हुए दोषी पुलिसवालों ने 4 घंटे तक कोर्टरूम से गैलरी तक हंगामा किया। उन्होंने अदालत पर भेदभाव का आरोप लगाते हुए कठघरे में लात मारी। कोर्टरूम की खिड़की तोड़ दी।