सरकारी अस्पतालों में इलाज और डॉक्टरों की लापरवाही किसी से छिपी नहीं हैं। बलरामपुर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग के सर्जन की लापरवाही से एक मरीज की आंख की रोशनी चली गई। आरोप है कि डॉक्टर ने मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए दो हजार रुपये भी वसूले।
ऑपरेशन के बाद जब पट्टी खोली तो मरीज की आंख में रोशनी ही नहीं आई। एक महीने बाद जब ऑप्टोमेट्रिस्ट से दोबारा जांच कराने पर पता चला कि डॉक्टर ने लेंस लगाया नहीं है। इस मामले में मरीज ने मुख्यमंत्री और अस्पताल के निदेशक से शिकायत की पर कोई सुनवाई नहीं हुई।
कैसरबाग, मॉडल हाउस स्थित बाईसी की मस्जिद निवासी गिरीश चंद्र गुप्ता (52) ने बायीं आंख में मोतियाबिंद की शिकायत पर बलरामपुर अस्पताल के ओपीडी कक्ष संख्या 121 में नेत्र सर्जन डॉ. महेंद्र प्रताप को दिखाया।
उन्होंने 18 अगस्त को भर्ती कर कुछ देर बाद ही ऑपरेशन कर दिया। गिरीश गुप्ता ने बताया कि डॉक्टर के कहने पर पत्नी पूनम गुप्ता ने दो हजार रुपये दे दिए। 19 तारीख को पट्टी खोली तो आंख में रोशनी नहीं थी।
इस पर डॉक्टर ने कहा कि सूजन कम होने के साथ ही रोशनी आ जाएगी। इस बीच कई बार डॉक्टर को दिखाया तो उन्होंने कुछ दिन में ठीक होने का आश्वासन दिया।
डॉक्टर ने नहीं लगाया था लेंस
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पांच अक्तूबर को काफी कहने सुनने पर एसएस ब्लॉक में दोबारा जांच कराई तो ऑप्टोमेट्रिस्ट ने बताया कि आंख में लेंस नहीं लगाया गया है। इसलिए चश्मा नहीं लग सकता है।
इस पर डॉक्टर ने कहा कि लेंस कहीं गिर गया होगा। कुछ देर बाद डॉक्टर ने कहा कि अब इसमें कुछ नहीं हो सकता। आपकी आंख की रोशनी हमेशा के लिए जा चुकी है।
गिरीश के अनुसार, शिकायत पर डॉक्टर ने कहा कि लेंस आंख के भीतर चला गया होगा। काफी तर्क देने के बाद डॉक्टर ने कहा कि मोटरसाइकिल चलाने पर लेंस झटके में कहीं गिर गया होगा।
इस पर गिरीश ने बताया कि वह बाइक तो दूर साइकिल भी चलाना नहीं जानते हैं। गिरीश चंद्र गुप्ता ने बताया कि मामले की शिकायत मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को स्पीड पोस्ट और अस्पताल के निदेशक डॉ. ईयू सिद्दीकी से लिखित की।
कई दिन गुजरने के बाद भी सुनवाई नहीं हुई। सोमवार को भी गिरीश अस्पताल के निदेशक, सीएमएस और चिकित्सा अधीक्षक से मिलने पहुंचे पर मुलाकात नहीं हुई।
वहीं, डॉ. महेंद्र प्रताप ने दोबारा जांच करने का आश्वासन देकर टरका दिया है। गिरीश का कहना है कि डॉक्टर ने ये नहीं बताया कि ऑपरेशन के बाद आंख की रोशनी जा सकती है। डॉक्टर ने आंख में लेंस डाला ही नहीं था।
रोशनी जाने से घर का खर्च चलाना हुआ मुश्किल
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- फोटो : अमर उजाला
गिरीश ने बताया कि वह फोटोकॉपी की दुकान से घर खर्च चला रहे थे। दुकान पर फार्म भरकर रोज 400 रुपये कमा लेते थे। आंख की रोशनी जाने से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया है।
बेटे कपिल, निखिल और सलिल की पढ़ाई पर भी बुरा असर पड़ रहा है। वहीं, पत्नी पूनम गुप्ता आरोप है कि डॉक्टरों की लापरवाही से पति की जिंदगी बेपटरी हो गई है।
सूत्रों की मानें तो बलरामपुर अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में ऑपरेशन के नाम पर खूब वसूली हो रही है। लेंस के लिए मरीजों से एक हजार से आठ हजार रुपये लिए जाते हैं जबकि इनका बिल भी नहीं दिया जाता है। ऑपरेशन के बाद मरीजों को चश्मा और कुछ जरूरी दवाओं के लिए मनमानी वसूली की जाती है।
‘मरीज की शिकायत मिली है। इस संबंध में सर्जन से पूछताछ कर जांच की जाएगी, जो भी दोषी होगा उस पर कार्रवाई की जाएगी। रुपये लेेने के आरोप गलत है। अस्पताल में दवा और लेंस उपलब्ध हैं’। -डॉ. ईयू सिद्दीकी, निदेशक, बलरामपुर अस्पताल
‘ऑपरेशन में कोई लापरवाही नहीं बरती गई। रुपये लेने के आरोप गलत हैं। ये सर्जिकल कांप्लिकेशन है जिसमें कुछ केसेज में ऐसा होता है। ऑपरेशन में लेंस लगाया गया था, वह मरीज की लापरवाही से निकल गया होगा। इसके बाद मरीज को कई बार बुलाया गया लेकिन वह नहीं आया। उसे मोतियाबिंद की अधिक शिकायत थी। इसको लेकर मैने उसे मना भी किया था। मरीज की गुजारिश पर सर्जरी की और उसे सभी तरह की जानकारी दी। मरीज को फिर से बुलाया गया है। उम्मीद है कि चश्मा लगाने के बाद रोशनी वापस आ जाएगी’। -डॉ. महेंद्र प्रताप, नेत्र सर्जन, बलरामपुर अस्पताल