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वीसी बदले, सत्ता बदली पर लखनऊ यूनिवर्सिटी नहीं बना वाई-फाई

Tue, 27 Jun 2017 01:04 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला/लखनऊ
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डेमो
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लखनऊ विश्वविद्यालय को मॉडल विश्वविद्यालय बनाना है। कैंपस को वाई-फाई बनाने के लिए पांच साल से दावे किए जा रहे हैं। पांच साल में कुलपति बदले, सरकार बदली, लेकिन एलयू की व्यवस्था नहीं बदली। आज तक कैंपस वाई-फाई नहीं हुआ और न हाल फिलहाल इसके आसार नजर आ रहे हैं। 
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लविवि कैंपस को पूरी तरह से वाई-फाई करने की बात पूर्व कुलपति प्रो. एस एस बरार के समय हुई थी। तब वाई-फाई केनाम पर लविवि ने खरीदारी भी की थी, लेकिन कुछ ही दिनों में मामला ठंडे बस्ते में चला गया। प्रो. बरार के बाद प्रो. मनोज कुमार मिश्र और छह माह की अवधि के लिए कुलपति जी. पटनायक के कार्यकाल में भी दावे तो हुए पर कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया।

वर्ष 2013 में कुलपति नियुक्त हुए प्रो. एसबी निमसे ने कैंपस को वाई-फाई करना पहली प्राथमिकता बताया था। उच्चतर शिक्षा अभियान से विवि को अनुदान मिला और 10 चरणों में वाई-फाई लागू करने की बात कही गई।  प्रो. निमसे का कार्यकाल भी इसी आधार पर बढ़ा।
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कार्यकाल विस्तार के समय अगले एक महीने में पहले फेज की शुरुआत होनेे की बात कह प्लानिंग बनी, लेकिन यह दावा भी खोखला साबित हुआ। नई सरकार बनने के बाद डिप्टी सीएम बने विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. दिनेश शर्मा के ट्वीट के बाद कैंपस को वाई-फाई करने की फिर आस जगी। लेकिन वाई-फाई की सुविधा तो दूर एलयू खुद की इंटरनेट व्यवस्था भी नहीं सुधार पा रहा है। 

डिग्री और प्रोविजनल की ऑनलाइन व्यवस्था नहीं

डेमो - फोटो : demo pic
शैक्षिक सत्र 2013-14 की शुरुआत में लविवि की वेबसाइट का नए सिरे से निर्माण शुरू हुआ। दावा किया गया था कि वेबसाइट बनने के बाद स्टूडेंट्स को अपनी डिग्री, माइग्रेशनल और प्रोविजिनल के लिए विवि के चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे।

वेबसाइट के माध्यम से छात्र कहीं से भी डिग्री के लिए आवेदन कर सकेंगे और विवि उनकी डिग्री तैयार कर देगा। लेकिन मॉडल विवि के लिए चुना गया एलयू अभी तक डिग्री और प्रोविजनल सर्टिफिकेट के लिए ऑनलाइन व्यवस्था शुरू नहीं कर पाया है।

उच्च शिक्षा विभाग की ओर से तीन साल पहले एलयू समेत सभी राज्य विश्वविद्यालयों को शिक्षक, स्टूडेंट्स और कर्मचारियों का डाटाबेस तैयार करने के लिए साढ़े 16 लाख रुपये का बजट जारी किया था। यह डाटाबेस विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर ऑनलाइन होना था।

इसके पीछे की मंशा थी कि विवि के साथ ही सभी संबद्ध कॉलेजों के स्टूडेंट्स, शिक्षक और कर्मचारियों की जानकारी एक क्लिक में मिल सके और कॉलेजों में होने वाले फर्जीवाड़े पर लगाम लग सके। लेकिन यह प्रक्रिया भी अभी तक पूर्ण नहीं हो पाई है।
 
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बायोमीट्रिक व्यवस्था के लिए नहीं की गई पहल

डेमो - फोटो : डेमो पिक
लविवि के इंटरनेट की यह खासियत है कि विवि प्रशासन द्वारा लिए गए ऑनलाइन जर्नल और साफ्टवेयर की सुविधा केवल उसी पर मिलती है। अगर किसी को विवि के ऑनलाइन जर्नल पढ़ने हैं तो उसके लिए विवि का इंटरनेट होना जरूरी है। शिक्षक कैंपस में खुद के लाए गए डोंगल के माध्यम से भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा सकते।

लविवि के इंटरनेट पर लॉग इन आईडी और पासवर्ड के जरिए ही ऑनलाइन जर्नल ओपन किए जा सकते हैं। यूजीसी भी इंफ्लिबनेट के जरिए लविवि को काफी ऑनलाइन जर्नल निशुल्क उपलब्ध कराता है। इसी तरह रिसर्च में प्लेगरिज्म (शैक्षिक चोरी) रोकने के लिए खरीदा गया सॉफ्टवेयर विवि के इंटरनेट पर ही खुलता है।

लेकिन एलयू में आए दिन इंटरनेट ध्वस्त रहता है। इंटरनेट ठप होते ही यह सॉफ्टवेयर काम करना बंद कर देता है। वाईफाई की सुविधा होती इस समस्या से छुटकारा मिल सकता था। वाई-फाई सुविधा न होने की वजह से ही लविवि को नैक ने बी ग्रेडिंग मिली थी। 

नई सरकार ने सभी शिक्षण संस्थानों में बायोमीट्रिक अनुपस्थिति दर्ज कराने का निर्देश दिया है। लेकिन एलयू व संबंध कॉलेजों में अभी यह व्यवस्था शुरू नहीं हुई है। लविवि ने इस बाबत अभी तक कोई दिशा-निर्देश भी नहीं जारी किए हैं।

शिक्षक व कर्मचारी उपस्थित रहते हैं या नहीं, उपस्थिति दर्ज कराने के बाद चले तो नहीं जाते, इसे जांचने का कोई पुख्ता सिस्टम नहीं है। शनिवार को ही कुलपति के औचक निरीक्षण में विभिन्न विभागों के 30 कर्मचारी नदारद मिले थे। 

नई सरकार की घोषणा के बाद वाईफाई की दिशा में काम शुरू किया जा रहा है। पुरानी प्लानिंग व मॉडल में बदलाव किया जा रहा है। साथ ही सरकार से इसके लिए बजट जारी होने का भी इंतजार किया जा जा रहा है। जहां तक बायोमीट्रिक सिस्टम की बात है तो लविवि इस ओर भी सोच रहा है और जल्द ही इसे लेकर प्रपोजल तैयार कर लिया जाएगा। - प्रो. एनके पांडेय, प्रवक्ता, लविवि

 
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