लखनऊ विश्वविद्यालय कैंपस मेें शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए कैंपस को वाई-फाई बनाने के दावे किये जा रहे हैं। वहीं दूसरी ओर परिसर के जूलॉजी विभाग में पिछले सात महीने से इंटरनेट सुविधा ठप पड़ी है। मुश्किल यह है कि यूजीसी के कई जर्नल सिर्फ लविवि के इंटरनेट पर ही खुल सकते हैं।
ऐसे में इंटरनेट न चलने से शोध और सामान्य जरूरत के काम भी रुके हुए हैं। इंटरनेट की खराबी की वजह पैनल में आई गड़बड़ी बताई जा रही है। विवि प्रशासन इसकी मरम्मत केंद्रीय स्तर पर कराना चाहता है, इसलिए विभाग भी इसे दुुरुस्त नहीं करवा पा रहा है। ऐसे में तमाम काम रुके हुए हैं।
विभागीय शिक्षकों ने बताया कि विभाग का इंटरनेट करीब सात महीने पहले खराब हो गया था। इसे शुरू करने के लिए विभाग में लगा पैनल बदला जाना है। इसकी लागत करीब 40 हजार रुपये आएगी। विभाग यह काम अपनी प्रयोगशाला खर्च मद से कराना चाहता है। सूत्रों का कहना है कि लविवि प्रशासन इसकी खरीद केंद्रीकृत मद में चाहता है, इसलिए अभी तक इंटरनेट दुरुस्त नहीं हो सका है।
लविवि के इंटरनेट की खासियत यह है कि विवि प्रशासन द्वारा लिए गए ऑनलाइन जर्नल और सॉफ्टवेयर की सुविधा केवल उसी पर मिलती है। अगर किसी को विवि के ऑनलाइन जर्नल पढ़ने हैं तो विवि का इंटरनेट जरूरी है। शिक्षक कैंपस में खुद के लाए गए डोंगल के माध्यम से भी इस सुविधा का लाभ नहीं उठा सकते।
वाई-फाई न होने से नैक ग्रेडिंग में निराशा
डेमो
लविवि के इंटरनेट पर लॉग इन आईडी और पासवर्ड के जरिए ऑनलाइन जर्नल ओपन किए जा सकते हैं। यूजीसी भी इंफ्लिबनेट के जरिए लविवि को काफी ऑनलाइन निशुल्क उपलब्ध कराता है। इसी तरह रिसर्च में प्लेगरिज्म (शैक्षिक चोरी) रोकने के लिए खरीदा गया सॉफ्टवेयर विवि के इंटरनेट पर ही खुलता है। इंटरनेट ठप होते ही यह सॉफ्टवेयर भी काम करना बंद कर देता है।
लविवि प्रशासन पिछले काफी समय से परिसर को वाई-फाई करने का दावा कर रहा है। शासन ने सभी राज्य विश्वविद्यालयों को वाई-फाई बनाने के लिए 50 करोड़ रुपये प्रस्तावित किए हैं। लविवि को उम्मीद है कि इसका एक भाग उसे जरूर मिलेगा। दोनों परिसर को वाई-फाई से युक्त करने में करीब आठ से नौ करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है।
इसके लिए कार्पोरेट सोशल रेस्पांसबिलिटी के तहत भी कुछ संसाधन जुटाने की बात कही जा रही है। हालांकि यह सिलसिला पिछले पांच साल से चल रहा है, लेकिन अभी तक कैंपस में वाई-फाई सुविधा शुरू नहीं हुई है। लखनऊ विश्वविद्यालय को चार साल पहले हुए नैक निरीक्षण में बी ग्रेड मिला था।
इसकी एक बड़ी वजह विवि की प्रयोगशाला, लाइब्रेरी के साथ ही स्टूडेंट्स को ऑनलाइन सुविधा और इंटरनेट कनेक्टिविटी न मिलना भी था। प्रदेश सरकार ने विवि को मॉडल विवि बनाने के लिए चुना है। इसके लिए इंटरनेट कनेक्टिविटी और वाई-फाई बहुत जरूरी है। इसके लिए बजट भी जारी किया गया, लेकिन वाई-फाई अभी भी विवि के लिए एक सपना ही है।
विभाग में इतने लंबे समय तक इंटरनेट ठप है, इसकी जानकारी ही नहीं थी। विभागाध्यक्ष को इसके लिए कुलपति से सीधे मिलना चाहिए था। बहरहाल इंटरनेट की सुविधा शुरू करने के लिए निर्देश जारी किये जा रहे हैं। जल्द ही विभाग में इंटरनेट शुरू हो जाएगा। - प्रो. एनके पांडेय, प्रवक्ता, लविवि