सबसे पहले बात मल्हनी की। परिसीमन में रारी से मल्हनी बनी सीट पर भाजपा को 1962 का चुनाव छोड़कर अभी तक कभी जीत हासिल नहीं हुई थी। 1962 में यहां जनसंघ ने जीत हासिल की थी।
उन्नाव की बांगरमऊ सीट पर भी 2017 से पहले भाजपा का खाता नहीं खुल सका था। 2017 में कुलदीप सिंह सेंगर ने भाजपा से चुनाव लड़कर यहां कमल खिलाने की साध पूरी की। घाटमपुर सीट पर भी 1977 से अब तक सिर्फ 2017 में ही भाजपा को जीत हासिल हुई।
फिरोजाबाद की टूंडला सीट पर 1996 में शिव सिंह चक ने भाजपा को जीत दिलाई थी। उसके बाद 2017 में यहां भाजपा के डॉ. एसपी सिंह बघेल चुनाव जीते थे। बुलंदशहर सीट पर भी भाजपा को अब तक केवल तीन बार जीत मिली है। एक बार जनसंघ को विजय मिली थी।
देवरिया सीट पर बीते छह चुनाव के नतीजों पर नजर डालें तो भाजपा तीन बार जीती है। परिसीमन के बाद हुए 2012 के विधानसभा चुनाव में अमरोहा की नौगांवा सादात सीट पर सपा ने जीत दर्ज की थी। 2017 में यहां से भाजपा के चेतन चौहान विजयी रहे थे।
ऐसी स्थिति में इन सीटों पर उपचुनाव की जीत या हार ही महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह भी दिलचस्प हो गया है कि मुख्य मुकाबला किन पार्टियों में होता है। इससे पता चलेगा कि 2022 के चुनाव में भाजपा के मुकाबले सियासी चौसर किस तरह सजने वाली है।