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यूपी उपचुनाव : सिर्फ तीन सीटें बताएंगी प्रदेश की भावी राजनीति की दिशा

Sun, 10 Sep 2017 12:38 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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चुनाव - फोटो : SELF
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प्रदेश में उपचुनाव तो सिर्फ लोकसभा की दो सीटों और विधानसभा की एक सीट पर होगा, पर लोकसभा की दो सीटों के उपचुनाव के नतीजे काफी कुछ बताने वाले होंगे।
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गोरखपुर और फूलपुर संसदीय सीट पर भाजपा से कोई भी लडे़, लेकिन माना यही जाएगा कि लड़ाई मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ही लड़ रहे हैं। 

प्रदेश में सरकार बनने के बाद ये पहले ऐसे चुनाव होंगे जिनमें मैदान में भाजपा की तरफ से लड़ने वालों से ज्यादा पर्दे के पीछे वालों की साख दांव पर होगी।
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नतीजों से प्रदेश की भावी राजनीति की दिशा का तो संकेत मिलेगा ही, लेकिन उससे ज्यादा यह पता चलेगा कि छह महीने की भाजपा सरकार को लेकर जनता के दिलोदिमाग में क्या चल रहा है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य क्रमश: गोरखपुर और फूलपुर से सांसद हैं।

विधान परिषद का सदस्य चुने जाने के बाद अब यह तय हो गया है कि ये दोनों जल्द ही अपनी संसदीय सीट छोड़ेंगे, जिन्हें भरने के लिए उपचुनाव कराने होंगे।

इसके अलावा विधानसभा की कानपुर देहात की सिकंदरा रिक्त है। ऐसा माना जाता है कि तीनों सीटों के उपचुनाव एक साथ ही होंगे।  

गोरखपुर का नतीजा होगा महत्वपूर्ण

गोरखपुर में उपचुनाव से पता चलेगा कि योगी के समर्थकों में कौन ऐसा भाग्यशाली है जिसे वह राजनीतिक उत्तराधिकारी बनाने लायक समझते हैं। कारण, पिछले पांच दशक में संभवत: यह पहला मौका होगा कि जब पीठ के किसी प्रमुख व्यक्ति के राजनीतिक रूप से सक्रिय रहते हुए भी वह यहां के चुनाव मैदान में सीधे सक्रिय नहीं होगा।

यह बात इस मामले में और महत्वपूर्ण हो जाती है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गुरु महंत अवेद्यनाथ 1962 से 1998 तक बीच में सिर्फ नौ साल छोड़कर (जब उन्होंने राजनीति से संन्यास ले लिया था) हमेशा गोरखपुर की चुनावी राजनीति में भागीदार रहे।

वह 1962 से 1980 तक गोरखपुर के मानीराम से विधायक रहे। बाद में वे 1989 में गोरखपुर से लोकसभा का चुनाव लड़े और सांसद चुने गए। वे 1991 और 1996 में भी गोरखपुर से सांसद रहे। 

वर्ष 1998 में उन्होंने अस्वस्थता के चलते अपने स्थान पर योगी आदित्यनाथ को चुनाव लड़ाया। महंत अवेद्यनाथ के गुरु दिग्विजय नाथ भी गोरखपुर से 1967 में सांसद रहे। जाहिर है, जो भी गोरखपुर में लोकसभा का उपचुनाव लड़ेगा वह कहने भर के लिए भाजपा का होगा।

वास्तव में वह न सिर्फ योगी की छाया होगा बल्कि उनका सबसे ज्यादा भरोसे का भी होगा। ऐसे में योगी के लिए उसे अपने से भी ज्यादा वोट दिलाना प्रतिष्ठा का सवाल रहेगा। योगी के सीएम होने के नाते यहां का नतीजा ज्यादा ही महत्वपूर्ण हो गया है।
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फूलपुर का परिणाम भी कम खास नहीं

भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने फूलपुर से पिछड़े वर्ग के ही किसी नेता को लड़ाने का मन बना लिया है। हालांकि प्रत्याशी पार्टी के नेताओं के साथ-साथ केशव प्रसाद मौर्य की भी पसंद का होगा।

दरअसल, आजादी के बाद से 2014 के पहले तक फूलपुर संसदीय सीट भाजपा के  लिए बंजर साबित होती रही। वर्ष 2014 में यहां से चुनाव लड़े केशव मौर्य भाजपा के पहले ऐसे भाग्यशाली नेता रहे जिन्होंने यहां कमल खिलाने में कामयाबी पाई।

पिछड़ा और मुस्लिम समीकरण वाली यह सीट उपचुनाव में भाजपा विरोधी दलों की चुनावी प्रयोगशाला भी बन सकती है। वहीं, अगर इस उपचुनाव में भी भाजपा विरोधियों को हराने में कामयाब रहती है तो इसका श्रेय भाजपा के साथ-साथ केशव मौर्य के हिस्से में भी जाएगा।

यह साबित हो जाएगा कि 2014 में केशव की जीत अनायास नहीं थी। उन्हें इस क्षेत्र के लोगों से पकड़ व पहुंच बनाए रखने का लाभ मिला था। कानपुर की सिकंदरा सीट भले ही पार्टी के किसी बड़े नेता की प्रतिष्ठा से जुड़ी न हो लेकिन वहां के नतीजे और भाजपा को मिले वोट कहीं न कहीं सरकार के छह महीने के कामकाज से जोड़कर देखे जाएंगे। 
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