बसपा के एक जिम्मेदार नेता ने बताया कि पार्टी सोशल इंजीनियरिंग से पीछे नहीं हटने जा रही है। गठबंधन की वजह से सीटें आधी से भी कम रह गई हैं। ऐसे में इस बार सोशल इंजीनियरिंग नए कलेवर में सामने आएगा। इस बार की सोशल इंजीनियरिंग में ‘सीटें कम-जीतें ज्यादा’ की ध्वनि होगी और पार्टी अपने सर्वकालिक प्रदर्शन से अच्छे नतीजे लाएगी।
आम चुनावों में प्रदेश में बसपा की सीटें
वर्ष--सीटें जीती
1991--01
1996--06
1998--04
1999--14
2004--19
2009--20
2014--00
बसपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 ब्राह्मण, 19 मुस्लिम, 17 अनुसूचित जाति, 8 ठाकुर और अन्य पिछड़ा वर्ग से 15 लोगों को टिकट दिए थे। इस बार सोशल इंजीनियरिंग 38 सीटों में करनी होगी।
गठबंधन इसलिए भी...
बसपा के एक वरिष्ठ नेता गठबंधन का निहितार्थ समझाते हुए कहते हैं,पार्टी के पास कुछ भी खोने को नहीं है। बेस वोट बने रहने के बावजूद पार्टी सीटें नहीं निकाल पा रही थी। 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट न मिलने के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में उम्मीद से बहुत कम कामयाबी मिली। दर्जनों सीटें 500 से 5000 वोट में अटक रही थीं।
गठबंधन से पार्टी के बेस वोट के साथ सपा का कुछ प्रतिशत भी मतदाता साथ आ गया तो तमाम सीटों पर वोटों का नतीजे में बदलना पक्का है। हालांकि वह यह भी कहते हैं कि सीटें कम होने से पार्टी का वोट शेयर घटने का खतरा भी रहता है, लेकिन जीती गई सीटों के सामने वोट शेयर का महत्व बाद में देखा जाता है।