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कांग्रेस-बसपा तालमेल पर फिलहाल विराम

Thu, 10 Oct 2013 08:35 AM IST
मनोज श्रीवास्तव/लखनऊ
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नरेंद्र मोदी के उभार और मुजफ्फरनगर दंगों के बाद बदली हुई सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस और बसपा के करीब आने की संभावनाएं राहुल गांधी और मायावती पर एक-दूसरे के आरोपों के बाद फिलहाल दम तोड़ती नजर आ रही हैं।
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हालांकि कांग्रेस के भीतर एक तबका अब भी मायावती से तालमेल का पक्षधर है क्योंकि उसे लगता है कि एक सुनिश्चित आधार वोट बैंक के बिना लोकसभा चुनाव में नैया पार नहीं होने वाली।

ताजे घटनाक्रम से उदास केंद्रीय इस्पात मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा तो कहते हैं कि दोनों दलों में तालमेल हो जाए तो अच्छा, पर संभव नहीं होगा।

गौरतलब है कि प्रदेश में मुलायम व मोदी की काट के लिए बेनी जब-तब बसपा से दोस्ती की वकालत करते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं कि दोनों का तालमेल ही मोदी और मुलायम के खिलाफ मजबूत विकल्प हो सकता है।
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पढ़ें-'राहुल को खेत-खलिहान की सिर्फ किताबी समझ'

बसपा सुप्रीमो मायावती को दो दिन पहले आय से अधिक संपत्ति के मामले में मिली राहत को दोस्ती के शुरुआती कदम के तौर पर भी देखा गया, पर उसी के साथ माया के धुर विरोधी व अनुसूचित आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया के मंच से राहुल गांधी द्वारा मायावती पर हमले ने ऐसे सारे आकलनों पर पानी फेर दिया।

हालांकि कांग्रेस का एक तबका कह रहा है कि इस संबंध में आखिरी फैसला दिल्ली सहित कई राज्यों में विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही होगा।

इस बीच राहुल के बयान के 24 घंटे भी नहीं बीते थे कि मायावती ने यह कहकर कि कांग्रेस की सरकार ने कांशीराम जी के निधन को राष्ट्रीय शोक घोषित नहीं किया, इसके लिए हमारे लोग कांग्रेस को माफ नहीं करने वाले हैं, बची-खुची संभावनाओं को भी खारिज कर दिया।

दरअसल, कांग्रेस और बसपा दोनों की मजबूरियां हैं और अनुभवों की कड़वाहट भी। दोनों दलों के नेता जनता के बीच कुछ भी बयान दें पर अंदरखाने नरेंद्र मोदी के बढ़ते ग्राफ का एहसास सबको है।

पिछले लोकसभा चुनाव में मिली सीटों के बचाने की चुनौती और चारकोणीय (सपा भाजपा, बसपा व कांग्रेस) मुकाबले के बीच छोटे दायरे में सिमट जाने का भी खतरा भी सता रहा है।

इन्हीं खतरों से उबरने की कोशिश दोनों को एक-दूसरे दलों के करीब ले जा सकती है। पर बसपा के एक पूर्व मंत्री कहते हैं कि तालमेल के हमारे अनुभव अच्छे नहीं रहे।
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तालमेल होने पर हमारा वोट दूसरे दलों को तो चला जाता है पर दूसरे दलों का वोट हमारे प्रत्याशी को नहीं मिलता। कोई समझौता बराबरी के लेन-देन पर चलता है।

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