आठ नामों में अधिकांश ऐसे चेहरे हैं जिनकी राजनीतिक पहचान भाजपा संगठन से बनी है। इनमें प्रियंका सिंह रावत और श्रुति कटियार को अपेक्षाकृत नए चेहरे माना जा सकता है। वहीं गोपीकृष्ण पांडेय, राधाकांत ओझा, धर्मपाल सिंह, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर और रामप्रताप सिंह जैसे नामों के जरिये पार्टी ने पुराने काडर को संकेत दिया है कि लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वालों के लिए उच्च सदन का रास्ता खुला है। सामाजिक समीकरण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। तीन अगड़े, तीन पिछड़े और दो दलित चेहरों के जरिए भाजपा ने अपने परंपरागत सवर्ण आधार को साधने के साथ ओबीसी और दलित मतदाताओं को भी प्रतिनिधित्व का संदेश दिया है।
राज्यसभा उम्मीदवार श्रुति गंगवार
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झारखंड के राज्यपाल और बरेली से कई बार सांसद रहे संतोष गंगवार की पुत्री होने के कारण श्रुति का चयन भाजपा के भीतर परिवारवाद के सवाल को फिर सामने लाता है। भाजपा लंबे समय से विपक्षी दलों पर यही आरोप लगाती रही है। ऐसे में संगठन की पृष्ठभूमि के बावजूद राजनीतिक परिवार से आने वाली श्रुति को राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी की कसौटियों पर सवाल खड़े करता है। हालांकि इसे पश्चिमी यूपी में कुर्मी समाज को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
राज्यसभा की सूची में क्षेत्रीय संतुलन भले पूरी तरह बराबर न दिखता हो, लेकिन सामाजिक और संगठनात्मक संदेश अधिक स्पष्ट है। भाजपा ने एक तरफ अगड़ों के बीच संभावित नाराजगी को कम करने की कोशिश की है, वहीं पिछड़ों और दलितों को भी यह भरोसा देने का प्रयास किया है कि उनका प्रतिनिधित्व सुरक्षित है। सबसे बड़ा संदेश यह है कि पार्टी संगठन में गुटीय दबाव या राजनीतिक विरासत के बजाय नेतृत्व की पसंद और चुनावी उपयोगिता को तरजीह दे सकती है।