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मोदी, राहुल को घेरना चाहते हैं सोनिया गांधी को नहीं,क्यों?

Tue, 25 Aug 2015 12:01 PM IST
राजेन्द्र सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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अमेठी और रायबरेली में 2014 के लोकसभा चुनाव के समय से कांग्रेस और भाजपा के बीच चली आ रही चुनावी धींगामुश्ती अब भी रह-रह कर दिख जाती है। प्रदेश की जिन सात लोकसभा सीटों पर भाजपा या उसके सहयोगी दलों के प्रत्याशी जीत नहीं पाए थे, उनमें अमेठी और रायबरेली में भाजपा की सक्रियता बनी हुई है।
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यूपी के सियासी हलकों में इसको लेकर चर्चा होती रही है कि क्या कांग्रेस की प्रतिष्ठा वाली इन सीटों पर कमल खिलाने की भाजपा की कोशिशें रंग ला सकती हैं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के हालिया दौरे के बाद एक बार यह सवाल फिर गर्म होता दिख रहा है।

लोकसभा चुनाव में अमेठी में स्मृति ने राहुल गांधी को अच्छी टक्कर दी थी। स्मृति को 34.38 और राहुल को 46.71 फीसदी वोट मिले थे। हालांकि रायबरेली में सोनिया को खास टक्कर नहीं मिल सकी। वह 63 फीसदी वोट पाकर विजयी रही थीं जबकि दूसरे नंबर पर रहे अजय अग्रवाल को महज 21 फीसदी मत मिले थे।
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भाजपा इन सीटों पर राहुल और सोनिया गांधी को चुनौती देने वाला माहौल बरकरार रखना चाहती है। पर, सियासी जानकार बताते हैं कि भाजपा चाहे खूब हाथ-पैर मार रही हो, लेकिन इन दो सीटों पर कांग्रेस को यूं ही चुनौती नहीं दी जा सकती। विकास योजनाएं लागू किए बगैर और स्थानीय समस्याओं के समाधान के बिना भाजपा की राह आसान नहीं होगी।

अभी तक नहीं किया जा सका है कोई काम

राहुल व सोनिया गांधी पर क्षेत्र की अनदेखी को लेकर सियासी वार करने वाली भाजपा को तस्वीर बदलने के वादों को पूरा करना होगा। पर, भाजपा सरकार में अभी तक दोनों क्षेत्रों में वोटरों का दिल जीतने वाला कोई बड़ा काम सामने नहीं आया है। हालांकि भाजपा नेताओं को लगता है कि स्मृति के जरिये राहुल को हिट विकेट किया जा सकता है, लेकिन अभी तक सोनिया गांधी की घेराबंदी करती भाजपा नहीं दिखरही है।

स्मृति और अजय अपने क्षेत्रों में सक्रिय
वैसे यह पहली बार ही हो रहा है कि इन दोनों सीटों पर कांग्रेस को टक्कर देने वाले भाजपा प्रत्याशी बाहरी होने के बावजूद क्षेत्र में लगातार संपर्क बनाए हुए हैं। जमीन तैयार करने वाले काम करने का प्रयास भी कर रहे हैं। स्मृति ने 23 अगस्त को 25 हजार महिलाओं का प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के पहले साल का प्रीमियम जमा कराया। उन्होंने रक्षाबंधन से पहले महिलाओं का लुभाने की कोशिश की।

यह कवायद इसलिए भी है कि महिलाओं के स्वयंसेवी समूह इस क्षेत्र में कांग्रेस और राहुल की ताकत माने जाते हैं। स्मृति 25 हजार पुरुषों के बीमा का प्रीमियम भी जमा करा चुकी हैं। भले ही योजनाएं जमीन पर न आई हों लेकिन उन्होंने अमेठी-ऊंचाहार के बीच रेल लाइन बिछाने और अमेठी-रायबरेली के बीच रेल लाइन के दोहरीकरण के सपने को जिंदा रखा है।

अजय अग्रवाल भी रायबरेली की समस्याओं के समाधान के लिए केंद्रीय मंत्रियों से गुहार-मनुहार करते दिखाई देते हैं। लेकिन सवाल वही है कि क्या उनके मैदान नहीं छोड़ने की जिद का जमीन पर कोई असर दिखेगा?

समस्याओं का अंबार, जनता को नहीं मिली राहत

अमेठी और रायबरेली में समस्याओं का अंबार है। इन्हीं का समाधान न होने को अमेठी में भाजपा ने राहुल के खिलाफ चुनावी मुद्दा बनाया था। पर, भाजपा की अगुवाई में केंद्र में एनडीए सरकार बनने के बावजूद यहां जमीनी स्तर पर अब तक कोई बदलाव नहीं दिखा। नए कारखाने आए नहीं, पुराने बंद होते जा रहे हैं। बेरोजगारी की समस्या वैसे ही है।

बीएचईएल की समस्या हो या इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज की, सवा साल में स्थिति जस की तस है। ग्रामीण सड़कों की बदहाली का मामला हो या बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का, लोगों को सब कुछ ज्यों का त्यों लग रहा है। एम्स में निर्माण कार्य चल रहा है लेकिन बनकर तैयार खड़ी ओपीडी शुरू नहीं कराई जा सकी। रायबरेली में महिला विश्वविद्यालय लटका पड़ा है। बीएचयू के कैम्पस पर तो अब चर्चा भी नहीं हो रही।

संसदीय चुनाव में काम आता है भावनात्मक लगाव
फिरोज गांधी पीजी कॉलेज रायबरेली के राजनीति विज्ञान विभाग के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष राम बहादुर वर्मा कहते हैं कि रायबरेली से नेहरू परिवार का आजादी से पहले से नाता है। 1921 में पं. जवाहर लाल नेहरू ने यहां किसान आंदोलन में हिस्सा लिया था। यह फिरोज गांधी, इंदिरा गांधी की कर्मभूमि है। इसी तरह अमेठी में संजय गांधी, राजीव गांधी चुनाव जीतते रहे।

रायबरेली व अमेठी बेहद पिछड़े इलाके थे। यहां कोई उद्योग लगेगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जाती थी।  20-25 साल पहले तक अमेठी, गौरीगंज देहात ही थे। उससे कुछ पहले तक जायस, जगदीशपुर छोटे से बाजार थे। वह कहते हैं, मैं 1966 में रायबरेली आया तो यह महज 30 हजार आबादी वाला कस्बा था। इस क्षेत्र का जो कुछ भी विकास हुआ, उसका श्रेय निश्चित तौर पर कांग्रेस को जाता है।

विधानसभा चुनाव में स्थिति अलग होती है और लोकसभा चुनाव में अलग। स्मृति ईरानी, अजय अग्रवाल या कोई दूसरा नेता, कितना भी दौरा करे, लोकसभा चुनाव के वक्त क्षेत्र के लोग गांधी-नेहरू परिवार के प्रति भावनात्मक लगाव में झुक जाते हैं। वह कहते हैं, मुझे नहीं लगता कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में कोई परिवर्तन हो पाएगा।
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राहुल को क्षेत्रीय नेता बनाना चाहती है भाजपा

आरआर पीजी कॉलेज अमेठी के राजनीति विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनिल कुमार शुक्ला मानते हैं कि अमेठी में स्मृति की सक्रियता बढ़ाकर भाजपा का शीर्ष नेतृत्व राहुल को उनके संसदीय क्षेत्र में उलझाए रखना चाहता है। कोशिश है कि उनका कद राष्ट्रीय के बजाय क्षेत्रीय नेता का बने।

वह कहते हैं, स्मृति ईरानी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजदीकी हैं। मानव संसाधन विकास जैसा अहम मंत्रालय उनके पास है। उनसे अपेक्षाएं बहुत हैं। ऐसे में चुनौती राहुल ही नहीं, स्मृति के सामने भी कम नहीं हैं। जिस विकास की अनदेखी के लिए वे राहुल पर हमला करती हैं, उसे कराने का वादा पूरा करना होगा।

वह कहते हैं, क्षेत्र के लोग जानते हैं कि अमेठी के विकास की बुनियाद संजय गांधी ने रखी थी। राजीव गांधी को ज्यादा समय नहीं मिल सका और राहुल गांधी उन्हें पूरा करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में नहीं लगता कि राहुल गांधी को स्मृति से कोई गंभीर चुनौती मिल पाएगी।

सोनिया के खिलाफ लाना पड़ेगा कोई बड़ा चेहरा
लखनऊ विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग के पूर्व अध्यक्ष डॉ. एसके द्विवेदी मानते हैं कि अमेठी और रायबरेली में भाजपा के पराजित प्रत्याशियों की सक्रियता उसकी दूरगामी चुनावी रणनीति का हिस्सा है। अमेठी में स्मृति ने लोकसभा चुनाव में छाप छोड़ी थी। उसके बाद भी वह मेहनत कर रही हैं।

क्षेत्र के लोगों से जुड़ी हुई हैं। बीमा पॉलिसी के लिए महिलाओं को जोड़ा है। वह राहुल के लिए कठिनाई पैदा कर सकती हैं, लेकिन रायबरेली में सोनिया गांधी के सामने अभी चुनौती नहीं दिख रही है।

राहुल राजनीति में विद्वता और वक्ता के रूप में अपनी छवि नहीं बना पाए लेकिन सोनिया की गंभीर राजनीतिज्ञ की इमेज बनी हुई है। रायबरेली में भाजपा को खड़ा होना है तो किसी बड़े चेहरे को सामने लाना होगा।
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