भाजपा पदाधिकारियों व कार्यसमिति के सदस्यों की लंबी-चौड़ी फौज खड़ी कर देने के बावजूद संगठन का ढांचा पूरी तरह दुरुस्त नहीं हो पाया। क्षेत्रीय व जातीय असंतुलन भी दूर नहीं हो पाया। कहीं एक ही क्षेत्र के कई-कई लोगों को जगह मिल गई है तो कहीं जिले के जिले यूं ही छूट गए हैं।
कार्यसमिति पर नजर डालें तो साफ दिखाई देता है कि संगठन के विस्तार में सिर्फ अपनों का खयाल रखा गया है। पार्टी संविधान व परंपराओं की अनदेखी की गई है।
पार्टी के एक पूर्व प्रदेश अध्यक्ष कहते हैं कि सदस्यता अभियान शुरू होने का मतलब है कि संगठन की चुनाव प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। दल की परंपरा के अनुसार, सदस्यता अभियान शुरू होने के बाद संगठनात्मक ढांचे का पुनर्गठन नहीं किया जा सकता।
प्रदेश अध्यक्ष को अपने पदाधिकारी तय करने का तो अधिकार है, पर पार्टी का संविधान उसे बीच सत्र में किसी पदाधिकारी को उसके पद से हटाने की अनुमति नहीं देता। जबकि वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष ने तीन पदाधिकारियों को पदों से हटाकर उन्हें कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया है।
मोदी के खिलाफ की थी बयानबाजी
विस्तार में दलबदलुओं को जगह दी गई है। बसपा के पूर्व सांसद बालकृष्ण चौहान को प्रदेश कार्यसमिति में शामिल करने पर तो बखेड़ा भी हो गया है।
मऊ जिला इकाई के पदाधिकारियों ने प्रदेश अध्यक्ष को लिखे पत्र में कहा है कि लोकसभा चुनाव के दौरान चौहान ने पार्टी व मोदी के विरोध में बयानबाजी की थी। कार्यसमिति में शामिल आनंद रत्न मौर्य और बृजेश मिश्र सौरभ भी पार्टी छोड़कर चले गए थे।
और भी हैं खामियां: पार्टी संविधान के मुताबिक, किसी पदाधिकारी को हटाने के लिए प्रदेश अध्यक्ष को कार्यसमिति की बैठक में प्रस्ताव रखकर उस पर स्वीकृति लेनी चाहिए थी। एक विकल्प संबंधित व्यक्ति से बातचीत करके उससे त्यागपत्र का आग्रह करना भी है।
साध्वी निरंजन ज्योति से तो त्यागपत्र का आग्रह करने में कोई कठिनाई ही नहीं थी। वे केंद्र में मंत्री हैं, ऐसे में भाजपा के ‘एक व्यक्ति-एक पद’ के सिद्धांत के नाते उन्हें उपाध्यक्ष पद से त्यागपत्र देने में शायद ही कोई आपत्ति होती।
पार्टी की नीति ही स्पष्ट नहीं
संगठन के विस्तार में कोई एक नीति नहीं रही है। तभी तो ‘एक व्यक्ति-एक पद’ का तर्क देकर निरंजन ज्योति को तो उपाध्यक्ष पद से हटा दिया गया, पर धर्मपाल सिंह को प्रदेश महामंत्री बनाया गया, जबकि वे विधानमंडल दल के उपनेता भी हैं।
संगठन के विस्तार में क्षेत्रीय समीकरणों के संतुलन की भी अनदेखी की गई। बहराइच की रहने वाली अनुपमा जायसवाल को प्रदेश मंत्री से पदोन्नति देकर महामंत्री बना दिया गया तो पड़ोस के गोंडा के रहने वाले पूर्व मंत्री रमापति शास्त्री भी महामंत्री बना दिए गए हैं।
निशाने पर कुछ बड़े नेता: संगठन के विस्तार में अपनों को तवज्जो के साथ ही खेमेबाजी के चलते कुछ बड़े नेताओं पर भी निशाना साधा गया है। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह प्रदेश महामंत्री पद पर तो बरकरार रखे गए हैं, लेकिन उन्हें किसी क्षेत्र का प्रभारी न बनाकर उनके पर कतरे गए हैं।
वहीं, समीर सिंह उपाध्यक्ष व प्रदेश महामंत्री न होते हुए भी कानपुर क्षेत्र के प्रभारी बना दिए गए हैं। नवनियुक्त प्रदेश महामंत्री धर्मपाल को पंकज सिंह की जगह गोरखपुर क्षेत्र का प्रभारी बना दिया गया है। राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह को हटाना भी किसी के गले से नीचे नहीं उतर रहा।
दलितों को भी नहीं मिली अधिक भागीदारी
दलितों को भागीदारी को लेकर भी पार्टी संतुलन नहीं रख सकी है। जाटव, खटिक, कोरी जैसी जातियों को तो प्रतिनिधित्व दिया गया है, पर भाजपा का समर्थक व परंपरागत वोट माने जाने वाले वाल्मीकि समाज को भाजपा कार्यसमिति या पदाधिकारियों की सूची में जगह नहीं मिल पाई है।
क्षेत्रीय कमेटियों व जिला अध्यक्षों में भी वाल्मीकि समाज का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।
प्रदेश में दलित वर्ग की लगभग 22 प्रतिशत आबादी में वाल्मीकि समाज की आबादी करीब 10 प्रतिशत मानी जाती है।