हरियाणा और महाराष्ट्र के नतीजे आ जाने के बाद अब उत्तर प्रदेश में भाजपा संगठन की चूलें कसने का काम शुरू हो जाएगा। ओम माथुर के नया प्रभारी घोषित होने के बाद यह बात पूरी तरह साफ हो गई है। पार्टी पदाधिकारियों की आरामतलबी अब नहीं चल पाएगी।
उन्हें कई कामों में जुटना पड़ेगा। माथुर को भले ही 2017 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यूपी की जिम्मेदारी दी गई हो लेकिन जो स्थितियां हैं, उनके चलते वे सिर्फ उसी एजेंडे पर खुद को केंद्रित नहीं कर सकते। उन्हें अन्य कई काम करने होंगे।
जुटना पड़ेगा इन कामों में: माथुर को आते ही जिन कामों में जुटना होगा, उनमें सदस्यता अभियान और पंचायत चुनाव प्रमुख हैं। इसके लिए उन्हें संगठन को जमीनी स्तर पर सक्रिय और चुस्त- दुरुस्त करना होगा।
ग्राम पंचायतों के पुनर्गठन की अधिसूचना 20 नवंबर तक जारी होनी है। इसके बाद जिला व क्षेत्र पंचायतों का पुनर्गठन होना है। जनवरी में पंचायत चुनाव की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। स्वाभाविक रूप से माथुर को इसके लिए भी तैयारी में जुटना होगा।
दमदार प्रदर्शन करना ही होगा
दरअसल, भाजपा ने पंचायत चुनाव तक में सक्रिय भागीदारी की घोषणा कर रखी है। जाहिर है पार्टी को यह चुनाव पूरे दमखम से लड़ना होगा क्योंकि नतीजे अनुकूल न आने पर विधानसभा चुनाव की तैयारियों पर असर पड़ेगा, जो भाजपा हाईकमान और माथुर कभी नहीं चाहेंगे।
इसके लिए अभी से प्रत्याशियों के चयन के साथ ही उन्हें प्रभावी तरीके से चुनाव लड़ने के लिए तैयार करना होगा। इसलिए माथुर को पंचायत चुनाव की परीक्षा में अच्छे अंकों से पास होने के लिए संगठन का ढांचा कसना होगा। सदस्यता अभियान को प्रभावी तरीके से चलाने के लिए भी संगठन को सक्रिय करना होगा।
जम्मू-कश्मीर व झारखंड चुनाव की चिंता: जम्मू-कश्मीर व झारखंड में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भी प्रदेश भाजपा को कई काम करने होंगे। पार्टी के वरिष्ठ लोगों को झारखंड और जम्मू-कश्मीर भी भेजा जाना है। इसके लिए नाम छांटने और टीम गठित करने का काम प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी के साथ प्रदेश प्रभारी को करना होगा।
इसके अलावा पार्टी की विभिन्न स्तरों पर कई बैठकें पहले से घोषित हैं। इनमें पदाधिकारियों की बैठक, कैराना में पार्टी की शिकस्त के कारण तलाशने के लिए बैठक और विभिन्न मोर्चों व प्रकोष्ठों की पूर्व में घोषित बैठकें शामिल हैं।
पदाधिकारियों पर मंडरा सकता है संकट
माथुर के निकटस्थ लोगों की मानें तो कड़े फैसले लेने के साथ उनके स्वभाव में सभी स्तर के कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद करते रहना शामिल है। अगर कोई क्षोभ या नाराजगी की बात उन्हें पता चलती है तो वे संबंधित व्यक्ति से बात करने में संकोच नहीं करते।
उनका यह स्वभाव प्रदेश भाजपा के कई पदाधिकारियों की मुसीबत बढ़ा सकता है। माथुर गुजरात से लेकर महाराष्ट्र तक पार्टी के कई मठाधीशों को हाशिए पर भेजने के लिए चर्चित रहे हैं।
ऐसे में, यहां भी सिर्फ समायोजन और प्रतिष्ठा दिलाने के चक्कर में पदाधिकारी बने लोगों के भविष्य पर संकट मंडरा सकता है।