प्रो. अली खान महमूदाबाद ने कहा कि सीएबी संविधान और भारत के विचार की हत्या है। लखनऊ विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति डॉ. रूप रेखा वर्मा ने कहा कि यह बिल केवल मुसलमानों के बारे में नहीं है बल्कि हमारे सांविधानिक मूल्य खतरे में हैं। अब्दुल हफीज गांधी ने कहा कि सरकार का प्रयास नागरिकता को धर्म केंद्रित बनाने का है।
प्रो. रमेश दीक्षित ने कहा कि सीएबी संविधान के धर्मनिरपेक्ष दर्शन के साथ ही संविधान के अनुच्छेद 14 का भी उल्लंघन करता है। डॉ. पवन राव अंबेडकर ने कहा कि सभी नागरिकों को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कतार में नहीं लगाया जा सकता है। ओवैस सुल्तान खान ने कहा कि एनआरसी एक निरर्थक प्रयास है जैसा असम के मामले में साबित हुआ।
मानवाधिकार कार्यकर्ता खालिद चौधरी ने कहा कि सीएबी और एनआरसी अल्पसंख्यकों के साथ ही दलितों, आदिवासियों, झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों और महिलाओं को भी प्रभावित करेगा।
रिहाई मंच के तारिक शफीक, संत कबीरनगर के जिला पंचायत सदस्य मोहम्मद अहमद, पूर्व मंत्री मुईद अहमद, ताहिरा हसन, सदफ जाफर, पूर्व जस्टिस बीडी नकवी, अतहर हुसैन सिद्दीकी, सुमय्या राना, एएमयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मशकूर अहमद उस्मानी, सुहैब अंसारी ने भी विचार रखे।