फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रावण के बहाने भाजपा की चुनावी चाल, वेस्ट यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ पर लगाम कसने की तैयारी

Fri, 14 Sep 2018 10:23 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
विज्ञापन
भीम सेना के मुखिया चंद्रशेखर उर्फ रावण - फोटो : amar ujala
विज्ञापन
सहारनपुर में जातीय टकराव से देश भर में सुर्खियों में आई भीम सेना के मुखिया चंद्रशेखर उर्फ रावण की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून से समय पूर्व रिहाई का फैसला सरकार ने यूं ही नहीं लिया है। इसके सियासी सबब भी हैं। इसके साथ ही गत 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान हिंसा फैलाने के आरोप में गिरफ्तार किए गए दलितों के जेल से बाहर आने का रास्ता साफ हो सकता है।
विज्ञापन


दरअसल, एससी-एसटी एक्ट को प्रभावी बनाने के बाद सवर्णों के निशाने पर आई भाजपा नहीं चाहती कि पश्चिमी यूपी में दलित-मुस्लिम गठजोड़ बने। यह गठजोड़ भाजपा के लिए खतरे की घंटी साबित हो सकता है।

पश्चिमी यूपी के अधिकतर जिलों में मुस्लिमों ही नहीं, दलितों की भी अच्छी खासी आबादी है। कई जिलों में उनकी तादाद 50 फीसदी से ऊपर है। दलितों में भी जाटव ज्यादा हैं। उनमें राजनीतिक, सामाजिक चेतना अपेक्षाकृत अधिक है। दशकों से दलितों व कथित तौर पर प्रभावशाली जातियों के बीच टकराव की घटनाएं सामने आती रही हैं।
विज्ञापन


एससी-एसटी एक्ट को प्रभावी बनाने की मांग को लेकर 2 अप्रैल 2018 को भारत बंद हुआ तो सबसे ज्यादा हिंसा पश्चिमी यूपी के जिलों में हुई। इससे पहले सहारनपुर में भी दलित व राजपूतों के बीच जातीय संघर्ष से ही रावण को देशव्यापी पहचान मिली।

रावण व अन्य दलितों के उत्पीड़न का मुद्दा प्रदेश की सीमा से बाहर निकलता जा रहा था। जिग्नेश मेवानी से लेकर जेएनयू के छात्र नेता तक रावण से जेल में मिल चुके हैं। रावण की रिहाई के लिए जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन में दलित एक्टिविस्ट व कई नेता शामिल हुए थे। वे यह संदेश देने में लगे थे कि प्रदेश सरकार दलितों का उत्पीड़न कर रही है।

जमानत मिलने के बावजूद रावण को राष्ट्रीय सुरक्षा कानूून में निरुद्ध कर दिया गया। आगरा, मेरठ, सहारनपुर, मुरादाबाद मंडल के कुछ जिलों में भारत बंद कराने वाले दलितों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमों और कई युवाओं के जेलों में बंद रहने से भाजपा के खिलाफ माहौल बनाने में आसानी हो रही थी।

यह स्थिति दलित-मुस्लिम गठजोड़ के लिए मुफीद बनती जा रही थी। कैराना लोकसभा उपचुनाव में बसपा ने खुले तौर पर किसी प्रत्याशी का समर्थन नहीं किया तो भीम सेना विपक्षी गठबंधन के रालोद प्रत्याशी के पक्ष में सामने आई। उसने भाजपा प्रत्याशी को हराने का आह्वान किया। कैराना संसदीय क्षेत्र की जो दो विधानसभा सीटें सहारनपुर जिले में पड़ती हैं, वहीं से भाजपा उम्मीदवार की हार के लिए सर्वाधिक वोट पड़े। माना जा रहा है कि दलितों की नाराजगी भी इसका एक कारण रही।
विज्ञापन

दलितों को मनाने के लिए डैमेज कंट्रोल

कैराना व नूरपुर उपचुनाव के नतीजों के बाद भाजपा इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि तमाम प्रयासों के बावजूद दलित वोट, खासतौर से जाटव उससे छिटक रहे हैं। यह स्थिति तब है जब भाजपा ने दलितों को लुभाने के लिए कई कदम उठाए। मेरठ की कांता कर्दम को राज्यसभा में भेजा। भाजपा ने कांता को ही सहारनपुर का प्रभारी बनाया।

पता नहीं, रावण की समय पूर्व रिहाई में उनकी कोई भूमिका है या नहीं। लेकिन, चूंकि भीम सेना अभी तक अराजनीतिक स्वरूप बनाए हुए है और बसपा से उसकी दूरियां बनी हुई हैं, ऐसे में भाजपा को लगता है कि रावण की समय पूर्व रिहाई से दलितों की नाराजगी दूर होगी। इसका लाभ उसे 2019 के चुनाव में होगा। इससे भाजपा को सपा-बसपा व रालोद के संभावित गठबंधन से बनने वाले दलित-मुस्लिम समीकरण को तोड़ने में मदद मिलेगी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें