लखनऊ। लखनऊ कथक घराने और कालिका बिंदादीन ड्योढ़ी की ख्याति को पूरी दुनिया में पहुंचाने वाले कथक गुरु पद्मविभूषण पंडित बिरजू महाराज की आज जयंती है। चार फरवरी 1938 को लखनऊ में जन्मे कथक गुरु ने अपने जीवन के अंतिम समय में भी कथक सिखाने का जुनून कायम रखा। बचपन से उनके साथ रहे छोटे भाई और शिष्य पंडित राम मोहन महाराज ने अमर उजाला से बातचीत में साझा किए उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू और किस्से।
पंडित राम मोहन महाराज ने बताया कि 17 जनवरी 2022 को कलाश्रम दिल्ली में पंडित बिरजू महाराज का देहांत हुआ और उससे कुछ दिन पहले तक भी वे कथक की बारीकियां सिखाने का जुनून अपने भीतर जिंदा रखे हुए थे। उससे पहले उन्हें कोरोना भी हो चुका था, लेकिन कथक को लेकर उनके भीतर का कलाकार हमेशा जीवंत बना रहा। एक रोचक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उनके पिता अच्छन महाराज की मृत्यु तो तभी हो गई थी जब वे केवल नौ वर्ष के थे। इसके बाद उन्होंने अपने चाचा शंभू महाराज और लच्छू महाराज से कथक सीखा।
जब उन्होंने मेरे पिता शंभू महाराज से सीखना शुरू किया तो उनकी शैली वीर रस से प्रभावित थी। इस पर दूसरे चाचा लच्छू महाराज कहते थे कि यह क्या लट्ठ मार रहे हो। वहीं जब लच्छू महाराज से सीखते तो शंभू महाराज कहते कि ये तो लड़कियों वाला नृत्य है। ऐसे में परेशान होकर बिरजू महाराज ने अम्मा से यह बात कही। उनकी सलाह पर इसके बाद उन्होंने अपने नृत्य की ऐसी शैली विकसित की जिसमें अच्छन महाराज का अंदाज था तो लच्छू महाराज के नृत्य जैसी नजाकत और शंभू महाराज जैसा वीर रस भी था। इन तीनों शैलियों को मिलाकर उन्होंने कथक को एक नया रूप-रंग दिया जिसकी आज पूरी दुनिया दीवानी है।
कहते थे ज्यादा चक्कर लगाने वालों को नृत्य का ज्ञान नहीं
65 वर्षीय राम मोहन महाराज बताते हैं कि पंडित बिरजू महाराज हमेशा कहते थे कि जो नर्तक कथक के दौरान ज्यादा गोल-गोल घूमकर चक्कर लगाते हैं, उन्हें नृत्य का गूढ़ ज्ञान ही नहीं होता है। बताया कि मैं जब सात साल का था तभी से वे मेरे गुरु थे और मैंने जो कुछ भी सीखा वह उन्हीं की देन है। उन्होंने बताया कि जब वे दिल्ली स्थित भारतीय कला केंद्र के अध्यक्ष थे तो मैं भी उनके साथ ही रहा। एक दिन मुझे नृत्य की प्रैक्टिस करते देख मुझे अपने कमरे में ले गए और बोले कि आज मैं तुम्हें वह सिखाऊंगा जो आज तक किसी को नहीं सिखाया। इसके बाद उन्होंने अपना कुर्ता उतारकर नाचना शुरू किया और कहा कि तुम बस सिर्फ यह देखो कि शरीर में कौन सी नस कहां घूम रही है। यह सीख गए तो कथक में नाम कमाओगे। वो चाहते थे कि उनके परिवार का एक सदस्य लखनऊ में ही रहे, इसलिए उनके देहांत के कुछ दिनों बाद ही मैं लखनऊ आ गया और भातखंडे विवि में वरिष्ठ गुरु के रूप में काम शुरू कर दिया।
फिल्मों में भी छोड़ी गहरी छाप
पूरी दुनिया में अपने कथक और गायिकी से नाम रोशन करने वाले पंडित बिरजू महाराज ने फिल्मों में भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। सत्यजीत राय की फिल्म शतरंज के खिलाड़ी का संगीत तैयार किया और दो गानों पर नृत्य के लिए गायन भी किया। 2002 में आई फिल्म देवदास के गीत काहे छेड़ छेड़ मोहे... का नृत्य संयोजन किया। डेढ़ इश्किया, उमराव जान, बाजीराव मस्तानी में भी कथक नृत्य का संयोजन किया। 2016 में बाजीराव मस्तानी फिल्म के गीत मोहे रंग दो लाल... के नृत्य निर्देशन के लिए उन्हें फिल्म फेयर पुरस्कार मिला। 2002 में लता मंगेशकर पुरस्कार और 2012 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार फिल्म विश्वरूपम में नृत्य निर्देशन के लिए मिला। उन्हें 1986 में पद्मविभूषण, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, कालिदास सम्मान मिला। काशी हिंदू विवि से उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि मिली।