बेनी बाबू की मुलायम सिंह यादव से गहरी दोस्ती थी। यही कारण था कि बेनी बाबू की मुलायम सिंह से खटकी तो बगावत कर अलग दल बना लिया फिर कांग्रेस में भी शामिल हो गये लेकिन नेता जी ने उनके खिलाफ एक शब्द भी नहीं बोला। 13 मई 2016 को बेनी की सपा में पुनः वापसी हुई। दल में वापस लौटने पर मुलायम सिंह यादव ने अपनी दोस्ती निभाते हुए बेनी प्रसाद वर्मा को तुरंत राज्यसभा भेज दिया।
दोनों में रिश्ते इतने गहरे थे कि बेनी बाबू ने दल तो छोड़ा पर मुलायम सिंह यादव ने अपने दिल से उन्हें नहीं निकाला। नेता जी उन्हें सूझबूझ वाला और प्रदेश की राजनीति का अच्छा ज्ञान रखने वाला नेता मानते थे। विकास की बात की जाए तो दोनों नेताओं ने एक ही दिन चुना। इटावा का सैफई हो या बाराबंकी का सिरौलीगौसपुर दोनों को ब्लॉक और तहसील का दर्जा एक साथ दिया गया।
संचार मंत्री के रूप में सैटेलाइट सिस्टम से सीधे बात करने की सुविधा भी सिरौलीगौसपुर से सैफई के लिए की गई। पांच दशक तक राजनीति के अर्श से फर्श तक का सफर तय करने वाले जिले के खाटी समाजवादी नेता बेनी प्रसाद वर्मा को राजनीति में रामसेवक यादव लाए थे पर उनकी दोस्ती के बीच के कुछ साल छोड़ दिए जाएं तो मुलायम सिंह यादव से इतने गहरे संबंध शायद किसी से नहीं थे।
सपा में नेता जी के बाद वही नंबर दो पर रहे हैं। अजीत सिंह के मुकाबले उन्हें मुख्यमंत्री बनाने में सबसे अहम भूमिका बेनी बाबू की ही था। कई बार उन्होंने खुद जिक्र करते हुए बताया कि वर्ष 1989 में मुलायम सिंह यादव और अजित सिंह के बीच उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए लाया गया तो उन्होंने यह कहकर ठुकरा दिया कि मुलायम मेरे मित्र हैं, मैंने उनका नाम प्रस्तावित किया है और वही मुख्यमंत्री बनेंगे।
चार बार सांसद और तीन बार विधायक बनने वाले जिले के पुराने नेता राम सागर रावत मुलायम सिंह यादव के निधन की सूचना पाकर भावुक हो गए। पूरा जीवन मुलायम सिंह यादव में आस्था रखने वाले राम सागर रावत के कहने पर मुलायम सिंह यादव उनके घर भी आए थे। राम सागर ने कहा कि मुलायम सिंह यादव समाजवादी विचारधारा के अग्रदूत थे।