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14 रुपये में कोई भी बन सकता है पीएम

Mon, 23 Sep 2013 12:34 AM IST
अभिषेक यादव/लखनऊ
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सिर्फ 14 रुपये खर्च करके कोई भी सीएम बनकर बात कर सकता है। मोबाइल से जिसे कॉल करेंगे, उसके स्क्रीन पर सीएम का नंबर ही दिखाई देगा।
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दरअसल, इंटरनेट के जरिए इस तरह की टेंपरिंग अब बहुत आसान हो गई है और कई वेबसाइटें क्रेडिट कार्ड के जरिए पैसे लेकर इस तरह की कॉल करवा रही हैं।

हाल में दबोचा गया जालसाज साहिल भी इसी एप्लीकेशन के जरिए आईएएस बनकर लोगों को ठगता था।

राजधानी के साइबर क्राइम विशेषज्ञों केअनुसार इस समय जीमेल से लेकर स्काइप तक वॉइस तकनीक पर आधारित कॉलिंग सुविधा दे रही हैं, लेकिन ये पहचान नहीं बदलते।

दूसरी ओर, बहुत सी वेबसाइटें ऐसे एप्लीकेशन उपलब्ध करा रही हैं, जिनमें कॉलर की पहचान (फोन नंबर) न केवल बदली जा रही है बल्कि दूसरे का नंबर मोबाइल फोन की स्क्रीन पर दर्शाया जा सकता है।

जालसाज साहिल ने खुलासा किया था कि उसने कॉलचीटर एप्लीकेशन का प्रयोग कर लोगों को चूना लगाया। साइबर क्राइम विशेषज्ञ सुमित सिंह बताते हैं कि ‘जॉइफर’, ‘स्पूफटेल’, ‘इंटरनेटकॉल’, ‘कॉलरबोट’, ‘आईडीफेकर’, ‘स्फूफकार्ड’ जैसी एप्लीकेशंस इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
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टेंपर डाटा तकनीक से खेल
इंटरनेट के जरिए होने वाली कॉल पैकेट डाटा ट्रांसफर तकनीक पर काम करती है। इसी पैकेट डाटा को बीच में टेंपर करके फेक कॉलिंग की जा सकती है। इसे टेंपर डाटा तकनीक कहा जाता है। यह डाटा ट्रांसफर तीन पक्षों पर आधारित होता है।

ऐसे बदलता है नंबर
होस्ट नंबर से डेस्टिनेशन नंबर पर होने वाली कॉल सूचना पैकेट डाटा में जाती हैं। इसी पैकेट में वेब एप्लीकेशंस की मदद से टेंपरिंग (छेड़छाड़) की जाती है। टेंपरिंग के दौरान एप्लीकेशन पैकेट डाटा से होस्ट नंबर को मिटाकर नया नंबर डाल देता है।

यह नया नंबर होस्ट कॉलर द्वारा पहले ही इस एप्लीकेशन में फीड किया गया होता है। साहिल के मामले में यह नया नंबर प्रशासनिक अधिकारियों और सीएम का था।

क्रेडिट कार्ड से पेमेंट
कुछ वेबसाइट्स 10 से 14 यूरो या डॉलर चार्ज कर रही हैं, जबकि कई 14 रुपये प्रति मिनट की कॉल रेट ले रही हैं। इसके लिए वेबसाइट पर यूजर को रजिस्टर करना होता है और क्रेडिट कार्ड से पेमेंट करना होता है। यह कॉल से पहले किया जाता है, यानी प्री-पेड प्रक्रिया अपनाई जाती है।

निगरानी की जरूरत
सुमित सिंह बताते हैं कि अमेरिका, यूरोप के अधिकतर देशों ने अपने यहां इंटरनेट पर निगरानी सिस्टम विकसित किया है। जिस भी वेबसाइट को वे संदिग्ध मानते हैं उसके सर्वर इंटरनेट प्रोटोकॉल (एसआईपी) को तुरंत ब्लॉक कर देते हैं।
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इससे वह वेबसाइट तो ब्लॉक होती ही है, इन देशों में उसी सर्वर से फिर कोई और वेबसाइट बनाकर भी नहीं चला सकता। नया सर्वर लगाना बेहद महंगा है और ऐसे में यह निगरानी सिस्टम बेहद सफल साबित हुआ है।
देश में अभी ऐसी पहल नहीं हुई है और दर्जनों वेबसाइट्स मनचाहे नंबर से कॉल और एसएमएस करने की सुविधा दे रही हैं।
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