वजीर बनने के बाद अपने राजा की ठसक, जाहिर है...बढ़ी ही है। नेताजी का भी जवाब नहीं है। एक तीर से दो निशाने लगा लिए।
कांटे बिछाने वाले खां साहब को ही कांटे हटाने की जिम्मेदारी सौंपकर उनकी ठसक कम की, वहीं खफा-से चल रहे राजा को भी मना लिया।
राजा की चौखट पर जाने के लिए खां साहब सफाई दे रहे हैं कि जो यूनिवर्सिटी की संग-ए-बुनियाद में साथ थे, वे अब भी हमारे साथ रहें...यह न्यौता देना हमारा फर्ज है।
काबीना में उनके ही एक साथी की टिप्पणी थी, फर्ज तो और भी हैं, कभी उन्हें भी याद कर लेते।