ट्रस्ट के संचालन में सबसे अधिक भूमिका चंपत राय व डॉक्टर अनिल मिश्र की ही रही है। अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास व कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरि की भूमिका भी सीमित ही रही, जबकि संस्थापक ट्रस्टी के. परासरन, जगद्गुरु वासुदेवाचार्य, जगद्गुरु विश्वप्रसन्न तीर्थ और युगपुरुष परमानंद अधिक आयु के कारण नियमित रूप से सक्रिय नहीं रह सके। महंत दिनेंद्र दास को भी हाशिये पर रखा गया। कामेश्वर चौपाल के निधन के बाद हाल ही में डॉ. कृष्ण मोहन को ट्रस्ट में शामिल किया गया। मंदिर प्रकरण में एफआईआर भी उनकी तहरीर पर दर्ज कराई गई है। बिमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र के निधन के बाद एक ट्रस्टी का पद पहले से रिक्त है।
विधि मामलों के जानकार अधिवक्ता दीनबंधु चौबे का कहना है कि श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुपालन में किया था। इसलिए ट्रस्ट को भंग करना या उसकी जगह नई व्यवस्था लागू करना केवल प्रशासनिक फैसला नहीं होगा। इसके लिए केंद्र सरकार को विधिक प्रक्रिया अपनानी होगी और आवश्यकता पड़ने पर नई अधिसूचना अथवा अन्य वैधानिक प्रावधान करने पड़ सकते हैं।
राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में संबंधित बैंक की भूमिका भी कम नहीं है। ट्रस्ट के माध्यम से तैनात कर्मियों को बैंक ने गणना जैसे महत्वपूर्ण कार्य में लगाया था और उन्हें वेतन देता था। बैंक के किसी अधिकारी या कर्मचारी के इतने महत्वपूर्ण कार्य में तैनात न होना भी घोर लापरवाही मानी जा रही है। पुलिस की जांच में ऐसे ही चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं और बैंक की करतूतों की पोल खुल रही है।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, राम मंदिर की दान पेटिकाओं की दो चाबियां रहती हैं। एक चाबी मंदिर ट्रस्ट और दूसरी बैंक को दी गई है। दोनों चाबियां साथ होने पर ही दान पेटिका खुलती थी। वहां से पेटिकाओं को स्ट्रॉन्ग रूम लाकर ताला खोला जाता था और गिनती करके यहीं पर रिसीविंग की व्यवस्था थी। रिसीविंग की तीन प्रतियां बनती थीं। एक प्रति बैंक कर्मी, दूसरी बैंक और तीसरी प्रति ट्रस्ट को मिलती थी। इन पर यहीं हस्ताक्षर भी किए जाते थे।
प्रतिदिन लगभग 20-25 लाख रुपये दान स्वरूप मिलते थे, जिनकी गिनती करके बैंक तक पहुंचाने में बैंक का अपना स्थायी कर्मी नहीं लगा था। बीच-बीच में बैंक के अधिकारी जायजा लेने आते थे। जबकि, खाता संचालन से लेकर धनराशि की गणना करके बैंक तक ले जाने के लिए ट्रस्ट का संबंधित बैंक से अनुबंध है। इसके बावजूद बैंक की ओर से लापरवाही की जाती रही, जिसका फायदा कर्मियों ने उठाया और मोटी रकम पार कर दी। सूत्रों के अनुसार, मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों की सिफारिश और उनके बताए अनुसार सभी कर्मियों को इस कार्य में बैंक ने लगाया था। वर्ष 2016 में बैंक से सेवानिवृत्त हो चुके सुभाष श्रीवास्तव को गणना के समय पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी दी गई थी। वह पिछले करीब पांच साल से बिना वेतन के मंदिर में सेवा कर रहे थे, लेकिन इस महत्वपूर्ण कार्य की निगरानी में उनके स्तर से भी लापरवाही बरती गई।
सूत्रों के अनुसार, गणना में शामिल कई कर्मी पहले से ही मंदिर में कार्य करते थे। निर्माण पूर्ण होने के बाद उन्हें कार्यमुक्त किया गया तो बाद में बैंक की मिलीभगत से यहीं पर गणना कार्य में लगा दिया गया। इनमें स्वर्गद्वार निवासी मनीष यादव लगभग दो माह पहले ही तैनात हुआ था लेकिन चोरी के खेल में वह सबके साथ ही शामिल हो गया। वह बैंक संबंधी पर्यवेक्षणीय कार्यों में तैनात चंपत राय के चालक टिन्नू का भतीजा है।
पुलिस अधिकारी सिर्फ दान पेटिकाओं से ही चोरी की बात स्वीकार रहे हैं, लेकिन मंदिर ट्रस्ट को सीधे तौर से दान की गई कीमती वस्तुएं और नकदी आदि में किसी तरह के गबन से इन्कार कर रहे हैं। हालांकि, निर्माण कार्य के दौरान दिए गए ठेकों में हुई अनियमितताओं पर मौन स्वीकृति दे रहे हैं। उसे अपने स्तर का मुद्दा न होना बताकर पल्ला भी झाड़ रहे हैं।
मंदिर में दो कंट्रोल रूम स्थापित हैं। इनमें गणना स्थल पर लगे कैमरे की निगरानी सुनिश्चित कराने का दायित्व आरएमओ अर्जुन देव का है। नियमतः हर समय वहां लगे कैमरे की निगरानी की जानी चाहिए, लेकिन आरएमओ इसका अनुपालन नहीं करा सके। सूत्रों के अनुसार, वह निगरानी कार्य छोड़कर मंदिर ट्रस्ट के प्रबंधन कार्यों में अधिक सक्रिय दिखते थे। गैर जनपद से तैनात सिपाहियों के जिम्मे ही निगरानी जैसा महत्वपूर्ण कार्य होता था। चोरी में शामिल कर्मियों ने इस लापरवाही और ढिलाई का भी खूब फायदा उठाया। फिलहाल अब तक आरएमओ की भूमिका तय नहीं हो सकी है।