अटल बिहारी वाजपेयी जमीन से जुड़े व्यक्ति हैं। बलरामपुर से उन्होंने अपना संसदीय सफर शुरू किया। इस दौरान उन्होंने कभी जमीन पर बैठकर खाना खाया, जीप में खुद धक्का लगाया। एक बार तो वह घोड़ी से जनसभा पहुंचे। यहां हैं अटल से जुड़ी कुछ यादगार कहानियां...
तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे अटल बिहारी का संसदीय सफर बलरामपुर से शुरू हुआ था। दरअसल 1957 में जनसंघ के टिकट पर अटल ने मथुरा, लखनऊ और बलरामपुर से चुनाव लड़ा था।
मथुरा, लखनऊ से तो हार गए लेकिन बलरामपुर की जनता ने उन्हें संसद पहुंचा दिया। 1957, 1962, 1967 में चुनाव लड़ने के दौरान वे अक्सर बलरामपुर आते रहे।
उनका व्यक्तित्व और ओजस्वी भाषण लोगों को बरबस ही खींच लाता था। भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष लाटबक्श सिंह बताते हैं कि प्रचार के दौरान अटल अपने सहयोगियों के साथ जमीन पर पंगत में बैठकर खाना खाते थे।
मुसलमान के घर भी जलपान व भोजन करने से उन्हें कोई गुरेज नहीं था। वे ज्यादातर खिचड़ी ही खाते थे।
ऐसे पहुंचे घोड़ी पर चढ़कर
अटल के एक परिचित बताते हैं कि उनको सबसे ज्यादा आम का अचार और दही पसंद था। इसके बिना वे भोजन नहीं करते थे।
वहीं 1957 के चुनाव के दौरान अटल चौखड़ा गांव में रात्रि विश्राम कर रहे थे। रातभर मूसलाधार बारिश हुई तो रास्तों में पानी भर गया।
सुबह उन्हें उतरौला और रेहरा बाजार में चुनावी सभा को संबोधित करना था। ड्राइवर ने कहा, कीचड़ में गाड़ी नहीं चल सकेगी। तब पालकी का इंतजाम किया गया।
अटल ने पालकी में बैठने से इन्कार कर दिया और एक परिचित की घोड़ी पर चढ़कर वहां पहुंचे और जनसभा को संबोधित किया।
खुद लगाते थे जीप में धक्का
बलरामपुर से पहली बार सांसद बने अटल साइकिलों के जत्थे के साथ गांव-गांव व घर-घर जाकर लोगों से वोट मांगते थे।
जिस गांव में रात हो जाती, वहीं डेरा जमा लते। अटल ने कई बार पैदल और बैलगाड़ी से भी प्रचार किया। अटल जी का बलरामपुर में राजनीतिक सफर 1957 से 1971 तक चला। हालांकि 1962 में उन्हें कांग्रेसी सुभद्रा जोशी से हारना पड़ा था।
अटल के सहयोगी और तुलसीपुर विधान सभा से जनसंघ के विधायक रहे सुखदेव प्रसाद किस्सा बताते हैं। 1957 में चुनाव प्रचार के लिए स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अटल को एक जीप मुहैया कराई थी।
जीप की हालत जर्जर थी। कुछ देर चलने के बाद ही रुक जाती थी। तब अटलजी खुद जीप में धक्का लगाते थे।
जब अटल को नहीं पहचान पाए कार्यकर्ता
1957 में चुनाव लड़ने के लिए अटलजी बलरामपुर पहुंचे। रेलवे स्टेशन पर उनकी ट्रेन रात 10 बजे पहुंची। उन्हें लेने के लिए पहुंचे जनसंघ के जिला महामंत्री रामदुलारे पाठक उन्हें पहचान नहीं पाए।
ट्रेन के डिब्बों और स्टेशन पर ढूंढने के बाद वे स्टेशन से बाहर निकलने लगे तो पीछे से एक आवाज ने उन्हें चौंका दिया, ‘पाठक जी किसे ढूंढ रहे हैं।’
पाठक जी ने भी सरल लहजे में कहा, अटलजी आने वाले थे। शायद नहीं आए। तब वह व्यक्ति हंस पड़ा और कहा, पाठकजी मैं ही हूं अटल बिहारी वाजपेयी।
राजकिशोर के अनुसार अटल जी उनके घर की रसोई में चूल्हे के पास ही बैठकर खाना खाते थे। उन्हें मां त्रिवेणी देवी के हाथ का खाना पसंद था।
सादा भोजन करने वाले अटल जी को गरमागरम चपाती और मिस्सी रोटी पसंद थी। वे अक्सर मां से कहते थे, अम्मा गरमागरम रोटियां सीधै थाली में ही दीयो।