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Lucknow News: पहले इंतजाम करना चाहिए था, फिर रोकनी थी आपूर्ति

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संवाद में शामिल लोग।
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लखनऊ। खाड़ी देशों में युद्ध के हालातों ने स्थानीय स्तर पर ईंधन की आपूर्ति व्यवस्था की कमर तोड़ दी है। बिना किसी पूर्व सूचना के अचानक व्यावसायिक सिलिंडरों की आपूर्ति रोके जाने से न केवल उद्योग ठप हो गए हैं, बल्कि आम जनता और व्यापारियों में भी अफरातफरी का माहौल है। बुधवार को अमर उजाला कार्यालय में आयोजित संवाद कार्यक्रम में पाठकों ने इस संकट पर अपनी बेबाक राय रखी।
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संवाद में शामिल लोगों ने कहा कि युद्ध की आहट के साथ ही गैस किल्लत की आशंका जाहिर थी। इसके बावजूद प्रशासन और आपूर्ति विभाग ने बिना किसी पूर्व सूचना या विकल्प दिए अचानक आपूर्ति रोक दी। यदि सरकार पहले से सचेत करती, तो उद्यमी और आम लोग अपने स्तर पर वैकल्पिक इंतजाम कर सकते थे।



अब गैस संकट का सीधा असर बाजार पर दिख रहा है। उद्योगों के बंद होने से हजारों मजदूरों की रोजी-रोटी पर संकट मंडरा रहा है। वहीं, अवसरवादी व्यापारियों ने उन वस्तुओं के दाम भी बढ़ा दिए हैं, जिनका गैस की कीमतों से कोई सीधा संबंध नहीं है। उपभोक्ता भी हड़बड़ी में सिलिंडर की बुकिंग करा रहे हैं, जिससे वेटिंग कई गुना बढ़ गई है। संवाद के दौरान पाठकों ने विदेशी गैस पर निर्भरता कम करने और देसी संसाधनों को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
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संवाद के प्रमुख बिंदु :



व्यावसायिक गैस या अन्य जरूरी सेवाओं की आपूर्ति रोकने से पहले एक निश्चित समय-सीमा दी जाए।



घरेलू उपभोक्ताओं के साथ ही उद्योगों के हितों का भी ध्यान रखा जाए, क्योंकि इनसे लाखों परिवारों का रोजगार जुड़ा है।



गैस संकट की आड़ में बेवजह कीमतें बढ़ाने वाले जमाखोरों और दुकानदारों पर प्रशासन सख्त कार्रवाई करे।



बायोगैस (गोबर गैस) और सौर ऊर्जा जैसे विकल्पों को सरकारी स्तर पर प्रोत्साहित किया जाए, ताकि विदेशी संकटों का असर कम हो।



मंदी की मार झेल रहे छोटे और मध्यम उद्योगों के लिए सरकार विशेष आर्थिक पैकेज या सब्सिडी की घोषणा करे।









संवाद में ये हुए शामिल



परशुराम कश्यप, दशमेश कुमार, रूपेश कुमार, देवेश अग्रवाल, रश्मि वर्मा, काकुल, रत्ना अस्थाना, राजेश गुप्ता, मनीष साहनी, विनय कुमार पांडेय, अनुराग पांडेय और प्रदीप कुमार सिन्हा।
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