कोशिश तो बहुत दिखी लेकिन मंत्रिपरिषद में पूरा क्षेत्रीय संतुलन बनाए नहीं बन पाया। सरकार बनने के बाद से ही मंत्रिपरिषद में बुंदेलखंड को भागीदारी नहीं मिल पाई थी। इस बार लोगों को भागीदारी मिलने की उम्मीद थी, पर यह पूरी नहीं हो पाई।
वहीं, सपा नेतृत्व कई अन्य जिलों की उदासी भी दूर करने में सफल नहीं हो पाया। कोशिश मुख्य रूप से पूर्व के समीकरणों को साधे रखने की ही दिख रही है।
आनंद सिंह, मनोज पारस व पवन पांडेय की विदाई, चितरंजन स्वरूप और राजेन्द्र सिंह राणा की मृत्यु और दो दिन पहले आठ मंत्रियों की बर्खास्तगी से पश्चिमी यूपी से मंत्रिपरिषद में छह लोगों, मध्य उत्तर प्रदेश खास तौर से अवध क्षेत्र से चार और पूर्वांचल के तीन सदस्यों का प्रतिनिधित्व घट गया था।
अब विस्तार में गाजियाबाद के बलवंत सिंह रामूवालिया, सहारनपुर के साहब सिंह सैनी, हापुड़ के मदन चौहान, बदायूं के ओंकार सिंह यादव, बड़खेड़ा (पीलीभीत) के हेमराज वर्मा के रूप में पश्चिम से पांच, पूर्वांचल से गाजीपुर की शादाब फातिमा, कुशीनगर के राधेश्याम सिंह, जौनपुर के शैलेन्द्र यादव ललई, संतकबीर नगर के लक्ष्मीकांत उर्फ पप्पू निषाद के रूप में चार लोगों को प्रतिनिधित्व देकर क्षेत्रीय संतुलन को पूर्ववत बनाए रखने की कोशिश की गई है।
साथ ही बहराइच से बंशीधर बौद्ध, सफीपुर (उन्नाव) के सुधीर कुमार रावत और फैजाबाद के पवन पांडेय को जगह देकर अवध क्षेत्र के समीकरणों को साधा गया है।
पश्चिम की भागीदारी अगर एक घटी है तो तीन कैबिनेट मंत्री देकर उसकी भरपाई करने की कोशिश की गई है। इस सारी कवायद के बावजूद बुंदेलखंड ही नहीं, बल्कि सोनभद्र इलाके की इच्छा भी पूरी नहीं हो पाई है।