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लैंड बिल: किसान को राहत न इंडस्ट्री खुश

Sat, 31 Aug 2013 10:47 AM IST
लखनऊ/मनोज श्रीवास्तव
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सरकार ने नया भूमि अधिग्रहण बिल लोकसभा में पारित कराने के साथ उम्मीद जताई है कि नया कानून बन जाने से किसानों को जमीन का उचित मुआवजा मिलने का रास्ता साफ हो जाएगा।
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इसके अलावा उद्योगों को विकास के लिए जमीन की कमी नहीं रह जाएगी, लेकिन हकीकत इसके उलट है। इस बिल को लेकर किसान से लेकर उद्यमी तक माथा पकड़ कर बैठ गए हैं।

दोनों ही मानते हैं कि वे ठगे गए हैं, उनकी अपेक्षाओं को बिल में जगह ही नहीं मिली। पीएचडी चैम्बर ऑफ कॉमर्स के सीनियर सेक्रेटरी (इन्फ्रास्ट्रक्चर) डॉ. रंजीत मेहता कहते हैं कि इस समय देश में करीब छह लाख करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट जमीन की अनुपलब्धता के कारण फंसे हैं।
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नए बिल के बाद उनके अस्तित्व में आने पर ही सवाल खड़ा हो गया है। भूमि अधिग्रहण की समस्या के कारण ही दक्षिण कोरिया की स्टील प्लांट लगाने वाली कंपनी पास्को अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर ओडिशा से जा रही है।

कंपनी वहां 24 लाख करोड़ की लागत से स्टील प्लांट लगाना चाहती थी, पर दस साल में जमीन के झमेले खत्म ही नहीं हुए। क्या आप समझते हैं कि नए भूमि अधिग्रहण कानून के बाद और बड़ी कंपनियां देश में बनी रहेंगी?
हालांकि चिंताएं किसान नेताओं की भी कम नहीं हुई हैं।

भूमि अधिग्रहण के मुद्दे पर किसान जागरण यात्रा पर निकले मनवीर सिंह तेवतिया कहते हैं कि इस बिल से उनकी यात्रा को और जनसमर्थन व बल मिलेगा क्योंकि साफ हो गया है कि इससे किसानों का भला नहीं होने वाला।

मायावती के शासनकाल में टप्पल और भट्टा पारसौल में भूमि अधिग्रहण के सवाल पर जबर्दस्त आंदोलन चला चुके तेवतिया कहते हैं कि यूपी, बिहार, उत्तराखंड, हरियाणा व दिल्ली की पदयात्रा के बाद जब वे 30 जनवरी को दिल्ली पहुंचेंगे तो किसानों का इस मुद्दे पर उबाल सरकार की नींद हराम कर देगा।

बिल पेचीदा, किसान विरोधी
लोकसभा में पेश किया गया नया भूमि अधिग्रहण बिल पूरी तरह किसान विरोधी है। बिल इतना पेचीदा है कि सरकार या प्राइवेट पार्टी को भी किसान से जमीन लेकर निर्माण कराना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

जमीन अधिग्रहण को लेकर पहले के मुकाबले ज्यादा कानूनी मुश्किलें खड़ी होंगी। बिल में सबसे गलत बिंदु यह है कि सर्किल रेट को ही मार्केट रेट बताया जा रहा है। हकीकत में सर्किल रेट और मार्केट रेट में काफी फर्क होता है।

होना यह चाहिए कि जिस काम के लिए जमीन ली जा रही हो, उसके लिहाज से जो रेट बनता हो उसका 60 फीसदी किसान को दे दिया जाए। प्रावधान यह भी होना चाहिए कि प्रस्तावित परियोजना के लिए जितनी जमीन की जरूरत हो, उसकी दोगुनी जमीन अधिगृहीत की जाए।

फिर अतिरिक्त अधिगृहीत जमीन का आधा हिस्सा किसानों को विकसित करके  दे दिया जाए। फिर उस विकसित जमीन में किसान को 25 फीसदी तक ही निर्माण कराने की कानूनी बंदिश लगा दी जाए।

शेष 75 फीसदी जमीन पर खेती होती रहे। सबसे बड़ी मुश्किल है कि जिन लोगों ने बिल बनाया है उन्हें किसान, जमीन और अधिग्रहण से किसानों और प्राइवेट कंपनियों को होने वाली दिक्कतों की कोई जानकारी ही नहीं है।
मनवीर सिंह तेवतिया
भट्टा पारसौल आंदोलन में 23 महीने जेल में रहे किसान नेता

नई इंडस्ट्री का रास्ता ही बंद हो जाएगा
नया बिल इंडस्ट्री के लिए न तो मुफीद है और न व्यावहारिक। कोर्ट-कचहरी में ज्यादा फंसाने वाला है। दिक्कत वाला पहला प्रावधान यह है कि जमीन के अधिग्रहण के लिए संबंधित इलाके  के 80 फीसदी लोगों की सहमति अनिवार्य कर दी गई है।

समाज के लोगों का जो हाल है, उस दृष्टि से यह प्रावधान नितांत अव्यावहारिक है। दूसरी दिक्कत मुआवजे को लेकर है। जमीन की कीमतों की जो स्थिति है, उसमें अगर कोई उद्यमी चलन में रेट का चार गुना मुआवजे में ही दे देगा तो वह बड़ी मुश्किल में फंस जाएगा।

उस इंडस्ट्री का जल्द मुनाफे में आना टेढ़ी खीर होगा। कोई इंडस्ट्री अगर किन्हीं कारणों से नहीं चल पाती है और मजबूरी में जमीन किसी को बेचती है, तो उस समय जमीन बेचने से होने वाले फायदे में से 40 फीसदी मूल विक्रेता को देने का प्रावधान भी अव्यावहारिक है।

कुल मिलाकर नए कानून के बाद सड़क, रेल, बिजली, बिजली और रियल एस्टेट के तमाम प्रस्तावित प्रोजेक्ट का अस्तित्व में आना मुश्किल होगा। मेरी राय में भूमि अधिग्रहण के मामलों में राज्य सरकारों का दखल बढ़ना चाहिए।

राज्य सरकारों को इंडस्ट्री के लिए अलग से लैंड बैंक बनाकर रखना चाहिए और उसे जमीन खुद मुहैया करानी चाहिए। अर्थव्यवस्था और औद्योगिकीकरण में रफ्तार तभी आएगी।
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डॉ. रंजीत मेहता
सीनियर सेक्रेटरी, इन्फ्रास्ट्रक्चर, पीएचडी चैम्बर आफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री
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