बाल विकास सेवा एवं पुष्टाहार (आईसीडीएस) निदेशालय में पंजीरी सिंडिकेट की सबसे बड़ी पेरौकार रहीं जिला कार्यक्रम अधिकारी (डीपीओ) कल्पना पांडेय को निलंबित कर दिया गया है। साथ ही उन्हें डीएम गोंडा के कार्यालय से संबद्ध करते हुए इस मामले की जांच लखनऊ के सीडीओ को सौंप दी गई है। कल्पना को पोषाहार के पैकेट पर बारकोडिंग कराने की शर्त की अनदेखी करने के आरोप में निलंबित किया गया है।
‘अमर उजाला’ ने 29 मई के अंक में ‘पोषाहार आपूर्ति : दो साल से बिना बारकोडिंग के ही चलता रहा खेल’ शीर्षक खबर प्रकाशित किया था। इस पर संज्ञान लेते हुए विभाग की तत्कालीन प्रमुख सचिव वीना कुमारी ने घोटाले के लिए प्रथम दृष्टया कल्पना पांडेय को जिम्मेदार मानते हुए निलंबित कर दिया है। इससे पहले कल्पना को अनधिकृत तरीके से अपर परियोजना प्रबंधक का पदनाम लिखने का भी दोषी पाया गया था।
गौरतलब है कि दो साल तक आंगनबाड़ी केंद्रों पर पोषाहार आपूर्ति के लिए पंजीरी सिंडिकेट के नाम से विख्यात 14 कंपनियों के साथ 25 अप्रैल 2018 को अनुबंध किया गया था। इसके तहत आपूर्तिकर्ता फर्म एक किलो पोषाहार के एक पैकेट पर बारकोडिंग कराने के बाद आपूर्ति करेगी। इसी तरह 20 पैकेट को एक अलग पैकेट में पैक किया जाएगा, इस पर एक कोड अंकित करना था।
जबकि विभाग के लिए यह प्रावधान किया गया था कि वह आपूर्ति शृंखला प्रबंधन पर निगरानी के लिए स्मार्ट इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम लागू करेगी। मगर, पंजीरी सिंडिकेट के दबाव में निदेशालय स्तर पर कोई कार्रवाई नहीं की गई और दो साल तक बिना बारकोडिंग के ही पोषाहार लिया जाता रहा। जबकि स्मार्ट इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम लागू करने और बारकोडिंग पर नजर रखने की जिम्मेदारी मुख्यालय में तैनात डीपीओ कल्पना पांडेय की थी।
अन्य कर्मचारियों के खिलाफ भी कार्रवाई के निर्देश
तत्कालीन प्रमुख सचिव वीना कुमारी ने जाते-जाते निर्देश दिए हैं कि स्मार्ट इन्वेंट्री मैनेजमेंट सिस्टम लागू न किए जाने के मामले में कल्पना पांडेय के अलावा जो अन्य कर्मचारी शामिल हैं, उनके नियुक्ति प्राधिकारी होने के नाते निदेशक खुद कार्रवाई करें। साथ ही निदेशक व वित्त नियंत्रक को यह भी आदेश दिया कि दोनों संयुक्त रूप से आकलन कर शासन को बताएं कि बारकोडिंग न कराने से पोषाहार आपूर्तिकर्ता फर्मों को कितना लाभ और सरकार को कितना नुकसान हुआ।
घटिया पोषाहार को छिपाने के लिए बारकोडिंग की अनदेखी
सूत्रों का कहना है कि निदेशालय में कार्यरत कुछ अधिकारियों और बाबुओं का कॉकस सरकार के हित में कम, पंजीरी सिंडिकेट के हित ज्यादा काम करता है। एक दशक में ऐसा एक समूह तैयार हो गया है, जो सिर्फ पंजीरी सिंडिकेट के इशारे पर ही काम करता है। बारकोडिंग की अनदेखी भी इसी का एक हिस्सा है। सूत्रों के मुताबिक तमाम कंपनियों द्वारा इसी तरह खराब गुणवत्ता वाले पोषाहार खपा दिए जाते हैं। ऐसे कई मामले सामने भी आ चुके हैं। लिहाजा उन्हें डर था कि अगर बारकोडिंग की जाएगी तो घटिया पोषाहार खपाने का खेल खत्म हो जाएगा। इसलिए उनके इशारे पर निदेशालय के जिम्मेदार भी बारकोडिंग कराने की ओर से आंखें मूंदे रहे।