बलिया वाले चौधरी साहब ने सपने में भी नहीं सोचा था कि एकाएक इतना तगड़ा ‘झटका’ भी लग सकता है।
बेचारे ‘नेताजी’ और ‘सरकार’ की ‘गुडबुक’ में होने की गलतफहमी पाल बैठे। खुलकर बैटिंग कर रहे थे। उनकी सक्रियता भी गजब की थी।
खास तौर पर ‘नेताजी’ और ‘सरकार’ को देखकर उनका जोश इतना बढ़ जाता था कि दूसरे लोग भी हैरत में पड़ जाते थे। विद्वता दिखाने में भी हमेशा आगे रहते थे।
मंत्रिमंडल विस्तार में चौधरी साहब के पर कतरने की चर्चा उड़ी लेकिन वह निश्चिंत थे कि उनका बाल भी बांका नहीं हो सकता। लेकिन विभाग बंटे तो चौधरी साहब हक्का-बक्का।
भारी-भरकम महकमे से हटाकर उन्हें छोटे से विभाग की कमान सौंप दी गई। दुखी तो बहुत हैं पर किसके सामने दुखड़ा रोएं। राजनीति में अपने-पराए का पता तो होता नहीं।
पता नहीं कौन क्या नमक-मिर्च लगाकर ऊपर तक बात पहुंचा दे। जो बचा है वह भी हाथ से चला जाएगा। ऐसे में अब वह जुबान बंद रखने में ही भलाई मान रहे हैं।