अपने खां साहब को आजकल संत प्रेम हो गया है। उनसे मिलने वालों में संत समाज के लोग भी अधिक आ रहे हैं।
खां साहब के इस संत प्रेम को लेकर विभाग के लोग भी अचंभित हैं। आखिर वह अचानक संत समाज को इतना तवज्जो क्यों देने लगे हैं? तवज्जो देने तक बात होती तो भी ठीक था।
संत समाज के साथ जो लोग मिलने आते हैं वे कामों का मोटा पुलिंदा लेकर आ रहे हैं। विभागीय अधिकारियों को सख्त हिदायत हैं कि संत समाज के साथ आए लोग जो भी काम बताएं उसे प्रमुखता से कराया जाए।
इसकी मॉनीटरिंग भी कोठी यानी खां साहब के आवास से हो रही है। अधिकारियों को काफी समय बाद यह बात समझ में आई कि लोकसभा चुनाव है और खां साहब चोला बदल रहे हैं।
वह एक ही समाज के नेता होकर नहीं रहना चाहते हैं। बताना चाहते हैं कि सभी वर्गों के लिए वह एक समान ही सोचते हैं।
खैर यह तो खां साहब की सोच हो गई, लेकिन अधिकारी तो खां साहब के संत प्रेम को लेकर परेशान हैं।