नौकरी की चली-चला की बेला में एक अफसर को खोदने और खाने की पहचान से जुड़े विभाग की मलाईदार कुर्सी मिली गई। वक्त कम था लिहाजा उन्होंने दिल खोलकर मातहतों को फेंटने शुरू कर दिए।
लिस्ट बनी नहीं प्रचार शुरू। फिर क्या था? कोई मनाने, कोई बचाने और कोई मनचाही जगह पाने के लिए जुट गया। वह इतना खुश हुए कि पहुंच और पकड़ के चक्कर में अपने मुखिया तक को भूल गए।
उन्हें गुमान था कि ‘सरकार’ तो अपने ही हैं सो मुखिया का क्या मतलब? मगर मुखिया उनसे तेज निकले। एक हाथ ककड़ी और नौ हाथ बिया...। सूचना ऊपर तक पहुंची।
फिर क्या था, सरकार ने पहले धंधे की थाह लगवाई। सच्चाई जानने की कोशिश की। खास की आंड़ में अकेले मलाई खाने का अंदाजा पक्का हुआ तो पैदल की राह दिखा दी। कुछ दिन बाद आराम वाली जगह पहुंचा दिए गए।
अभी वह बाकी के दो महीने का बढ़िया वक्त गुजारने के जुगाड़ में ही लगे थे कि भांडा ही फूट गया। उनके सारे फरमान रद्द। बड़ी मशक्कत के बाद फर्श से अर्श पर पहुंचे मातहत अचानक अर्श से फर्श पर पहुंच गए।
अब वे उनका चक्कर काट रहे हैं और साहब पीछा छुड़ा रहे हैं। उनके नजदीक से देखने वाले कह रहे हैं कि साहब चला-चली की बेला में सिर धुनि-धुनि पछता रहे हैं।