सूबे के एक मंत्री हैं, नाम के आगे डॉक्टर भी लिखते हैं। कहीं भी कैसा भी दीया-बाती, फीता-काटी आयोजन हो, जाने में गुरेज नहीं।
विभाग वालों ने करोड़ों की लागत से बनने वाले एक प्रोजेक्ट में उन्हें बुलावा भेज दिया। प्रोजेक्ट भी छोटी-मोटी चीन की दीवार बनाने जैसा ही था।
पहले फीता-काटी का मुहूर्त सुबह का था, लेकिन राहुकाल के चक्कर में उसे शाम का कर दिया गया। सब कुछ तैयार था, टेंट, तंबू, कनात, चाय-पानी वाले सब सुबह से ही तैयारियों में जुट गए।
सब कुछ ठीक था कि दिल्ली में दोपहर से पहले ही चुनावी रणभेरी बज गई और लागू हो गईं पाबंदियां। जब शाम को आयोजन का वक्त आया तो अधिकारियों ने मंत्रीजी को चुनावी रणभेरी की याद दिलाई।
बस क्या था, मंत्री जी ने कमरे में टंगी नेताजी की तस्वीर का हवाला दिया और मन मसोस कर मना कर दिया।
लेकिन अब डॉक्टर साहब उस राहुकाल का सुर्रा छोड़ने वाले की सरगर्मी से तलाश करते फिर रहे हैं। सोच रहे हैं कि अगर-मगर के फेर में न फंसते तो अगले दिन कहीं मुखिया के बगल में ही चमक जाते।