भाजपा में हाल ही में शामिल हुए एक ‘नेताजी’ अवध में तीन सीटों के दावेदार थे।
एक पर खुद लड़ना चाहते थे तो दूसरे पर बेटे की पैरोकारी थी। तीसरे पर कदम से कदम मिलाकर चलने वाले एक दलित नेता को आश्वासन था।
मगर जब सूची जारी को तो महीनों के दावे हवा में रह गए। दलबदल कर खुद तो टिकट पा गए लेकिन न बेटे को दिला सके न खासमखास को।
हालांकि ये ‘नेताजी’ कहते भी हैं कि उन्हें कभी कुछ मांगे नहीं मिलता, संघर्ष से हासिल करना होता है।
उनके पट्ट समर्थक कहते हैं कि नेता की चाल तो अब शुरू हुई है। चुनाव में उनकी चालें देखने वाली होंगी।