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यूपी में सपा-बसपा गठबंधन : जाति का सियासी जोड़, मुकाबला बेजोड़

Sat, 09 Mar 2019 12:57 PM IST
तिवारी अभिषेक राजेंद्र सिंह, अमर उजाला लखनऊ

सार

  • 43.6  फीसदी वोट भाजपा गठबंधन को 2014 में
  • 42.98  फीसदी सपा-बसपा, रालोद को मिलाकर
  • 2014 में सपा-बसपा-रालोद से ज्यादा था भाजपा-अपना दल का वोट शेयर
  • 2017 में सपा-बसपा-आरएलडी ने भाजपा गठबंधन से 4.5% ज्यादा वोट लिया
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सपा, बसपा
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की दूसरी वर्षगांठ की तैयारियों के बीच 2019 की चुनावी जंग का मैदान सज गया है। 2014 के लोकसभा व 2017 के विधानसभा चुनाव में सफलता के झंडे गाड़ने वाली भाजपा को चुनौती देने के लिए सपा-बसपा ने गठबंधन किया। अब भाजपा के सामने मोदी मैजिक बरकरार रखने की चुनौती है तो सपा-बसपा गठबंधन उसका तिलिस्म तोड़ने के लिए ताकत झोंक रहा है। नए सियासी हालात में भाजपा की राह कंटीली है तो गठबंधन की पथरीली। 
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केंद्र में पांच और राज्य में दो साल से सरकार चला रही भाजपा को रोकने के लिए सपा-बसपा 26 साल बाद साथ आए हैं। दोनों का मजबूत सामाजिक-जातीय आधार है। अखिलेश यादव व मायावती का नेतृत्व है तो भाजपा के पास सरकार की उपलब्धियां, मजबूत संगठन, मोदी-योगी और अमित शाह जैसी लीडरशिप है। गठबंधन से निसंदेह भाजपा की चुनौती बढ़ी है। ऐसे में अहम सवाल यह है कि क्या भाजपा यूपी में जीत का रिकॉर्ड कायम रख पाएगी ? क्या 1993 की राम लहर में भाजपा को सत्ता से रोकने वाले सपा-बसपा गठबंधन की धार अब भी उतनी ही है?

राजनीतिक पंडित 1993 से 2019 की तुलना को वाजिब नहीं मानते। तब चतुष्कोणीय मुकाबले के हालात थे। अब ज्यादातर सीटों पर सीधे और कुछ जगह तिकोने मुकाबले के आसार हैं। 1993 विधानसभा चुनाव में भाजपा को 33.3 प्रतिशत, सपा-बसपा गठबंधन को 29.06, कांग्रेस को 15.08 और जनता दल को 12.3 फीसदी वोट मिले थे। अब भाजपा का वोट बैंक बढ़ा है, कांग्रेस कमजोर हुई है।
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सपा-बसपा गठबंधन का जातीय आधार ओबीसी, अजा और मुस्लिम हैं। इनमें नौ-दस प्रतिशत यादव, 12 फीसदी जाटव व 18 फीसदी मुस्लिमों को गठबंधन का कोर वोटर माना जाता हैं। गठबंधन की चुनौती इस पर है कि उसे पिछड़े वर्ग की गैर यादव और अनुसूचित जाति की गैर जाटव जातियों में कितना समर्थन मिलता है। भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी कर पाती है या नहीं।

उपचुनाव के नतीजों से उत्साहित सपा-बसपा पिछड़ों-दलितों की गोलबंदी की सोशल इंजीनियरिंग से लोकसभा तक पहुंचने में लगी है। वहीं, भाजपा सवर्णों के साथ गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव अनुसूचित जातियों को साथ बनाए रखने के जतन कर रही है। इसी समीकरण से 2014 व 2017 में भाजपा ने बड़ी जीत हासिल की थी। 
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सपा-बसपा की ताकत

  • अनुसूचित जाति-जनजाति, पिछड़ों  व अल्पसंख्यकों में व्यापक आधार
  • 12 फीसदी जाटव, 9-10% यादव, 18 फीसदी मुसलमान कोर वोटर
  • भाजपा विरोधी सेकुलर मतदाताओं के सामने गठबंधन मजबूत विकल्प
  • पिछले लोस चुनाव में सपा-बसपा को 42.12 फीसदी वोट मिले जो भाजपा के 42.6% के लगभग बराबर
  • 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा को भाजपा और अपना दल से लगभग ढाई फीसदी ज्यादा वोट मिले।
  • कांग्रेस से पि्रयंका के उतरने और गठबंधन की ओर से सवर्णों को टिकट मिलने से भाजपा के जातीय आधार में घुसपैठ की कोशिश

गठबंधन की चुनौतियां
  • क्या ट्रांसफर होगा कोर वोट
  • सपा-बसपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती कोर वोट एक-दूसरे को ट्रांसफर कराने की है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं में एका कायम करना आसान नहीं होगा। सीट बंटवारे के बाद दोनों दलों के स्थापित नेता अपनी सियासी पहचान बनाए रखने के लिए नया विकल्प चुन सकते हैं। पिछले ढाई दशकों में प्रदेश की राजनीति ने यादव बनाम दलित का रूप लिया है। ऐसे में क्या अखिलेश और माया के हाथ मिलाने से द्वंद्व एकदम समाप्त हो जाएगा? 
  • गैर यादव, गैर जाटव वोट
  • गठबंधन का कोर वोट यादव, जाटव व मुस्लिमों को माना जाता है। इनकी लामबंदी से भाजपा के पक्ष में गैर यादव ओबीसी व गैर जाटव एससी वोटों का ध्रुवीकरण रोकना चुनौती होगी। पिछले लोकसभा चुनाव में गैर यादव पिछड़े और गैर जाटव दलित भाजपा की जीत का आधार बने थे। गठबंधन के सामने इनमें अपनी पैठ को और बढ़ाने की चुनौती है।
26 साल पहले राम लहर रोकने को मिले थे मुलायम-कांशीराम
मुलायम सिंह यादव ने 1992 में समाजवादी पार्टी बनाई। रामलहर के दौर में 1993 में हुए विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा मिलकर चुनाव लड़े। तब सपा 256 और बसपा 164 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। 
मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बने, हालांकि दो साल बाद बसपा ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था।

भाजपा की ताकत

  • पूरे प्रदेश में भाजपा का मजबूत संगठन और बूथ तक नेटवर्क
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे चेहरों के साथ ही अमित शाह जैसे कुशल रणनीतिकार
  • तीन महीने से एक के बाद एक कार्यक्रमों के जरिये जनता में पहुंच बनाना, कार्यकर्ताओं को काम का टारगेट देना
  • सोशल इंजीनियरिंग से सभी वर्गों को साधने का अनुभव।
  • गैर यादव ओबीसी व गैर जाटव अजा तक पहुंच बनाने की कोशिश, सवर्ण सहित परंपरागत वोटरों का भरोसा।
  • केंद्र व प्रदेश की उपलब्धियां, सामाजिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और किसानों से जुड़ी योजनाएं, मोदी का खुद यूपी में सकि्रय रहना

उत्तर प्रदेश में गठबंधन के सामने भाजपा की चुनौतियां
आखिर कैसे बनेगा जातीय संतुलन : भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती जातीय संतुलन साधने की है। भाजपा का टारगेट नौ-दस फीसदी यादव और 12 फीसदी जाटवों के अलावा शेष हिंदू आबादी है। इनमें 20 प्रतिशत सवर्र्णों में भाजपा की पहुंच गहरी है, लेकिन गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव एससी-एसटी आबादी तक पैठ को और मजबूत बनाना होगा।

50 फीसदी प्लस वोट का लक्ष्य

भाजपा ने 2019 के लिए 50 फीसदी से ज्यादा वोट जुटाने का लक्ष्य रखा है। इसके लिए परंपरागत सवर्ण वर्ग में जनाधार कायम रखते हुए गैर-यादव ओबीसी व गैर-जाटव एससी-एसटी को साधना होगा। यह चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इन वर्गों को शासन-प्रशासन में सवर्ण वर्ग के दबदबे और अपनी उपेक्षा की शिकायत रहती है।

सरकार होने की जवाबदेही भी चुनौती
भाजपा पांच साल से केंद्र और दो साल से यूपी में सरकार चला रही है। कहीं, सरकार तो कई जगह सांसदों, विधायकों से नाराजगी है। राम मंदिर, कश्मीर, बेरोजगारी और किसानों के मुद्दों पर भी कुछ लोग सरकार के कामकाज से खुश नहीं है। ऐसे में सत्ता विरोधी रुझान से निपटना भी भाजपा के लिए चुनौती है।
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यूपी की जिन सीटों पर प्रत्याशी घोिषत जानें उनका हाल

कांग्रेस : 11 सीटों पर सिर्फ दो सांसद, वह भी राहुल और सोनिया, दो पर रनरअप
कांग्रेस ने 11 सीटों पर प्रत्याशी घोषित किए हैं। इनमें वर्ष 2014 में वह दो परंपरागत सीटें रायबरेली व अमेठी जीती थी। केवल 2 सीटों सहारनपुर व कुशीनगर में रनरअप रही। बाकी पर कोई असर नहीं दिखा। वर्ष 2009 में इन 11 सीटों में कांग्रेस 8 पर जीती थी।

सपा : 9 में से चार टिकट परिवार को, डिम्पल भी लड़ेंगी
सपा ने भी यूपी की नौ सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए। शुक्रवार को आई पहली सूची में मैनपुरी से मुलायम सिंह यादव, बदायूं से वर्तमान सांसद धर्मेंद्र यादव और फिरोजाबाद से अक्षय यादव का नाम है। फिरोजाबाद से ही प्रसपा अध्यक्ष शिवपाल सिंह पहले ही लड़ने की घोषणा कर चुके हैं। देर शाम तीन प्रत्याशियों की दूसरी सूची में कन्नौज से डिंपल यादव को टिकट दिया गया है। परिवारवाद का आरोप झेल रही सपा ने 9 में से 4 प्रत्याशी घर के उतारे हैं। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि डिंपल अब चुनाव नहीं लड़ेंगी। इसके बावजूद उन्हें मैदान में उतार दिया गया।
 
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