गोंडा के देवरदा गांव की बेटी आकांक्षा तिवारी ने पीसीएस जे में पहला स्थान हासिल कर नाम रोशन किया है। गोंडा के साथ ही दिल्ली में पढ़ाई करके आकांक्षा ने यह मुकाम हासिल किया है। उन्होंने कहा कि इस मुकाम को हासिल करने में परिवार के साथ ही गुरु जनों का सहयोग रहा। वहीं बभनजोत के रहने वाले व झंझरी ब्लाक में शिक्षक राम प्रताप वर्मा के बेटे गौरव पटेल ने पांचवा स्थान हासिल कर नाम बढाया है।
पीसीएस जे में पहले स्थान पर बेलसर के देवरदा गांव की बेटी आकांक्षा तिवारी ने पीसीएस जे में पहला स्थान हासिल किया है। उनके पिता शिवपूजन ने कहा कि बेटी ने टाप करके साबित कर दिया की मेहनत करने वालों की हार नहीं होती।
वहीं आकांक्षा ने कहा कि उन्हें खुशी है कि उन्होंने अपने परिवार की उम्मीद को पूरा किया। उन्होंने सफलता का श्रेय माता पिता के साथ ही गुरु जनों को दिया। कहाकि पूरी कोशिश होगी कि देश में न्याय हो और हर पीड़ित को उसका हक मिले।
इसी तरह पांचवें स्थान पर बभनजोत ब्लाक के घारीघाट निवासी राम प्रताप वर्मा ने कहा कि वे एक शिक्षक हैं और पत्नी गायत्री देवी छावनी सरकार प्राइमरी स्कूल में शिक्षामित्र हैं। उन्हे फक्र है अपने बेटे पर कि उसने बाबा और दादी के सपने को साकार किया है।
पीसीएस जे में पांचवें स्थान पर रहे गौरव पटेल ने कहा कि उनके परिवार ने सदा साथ दिया और आज खुशी है कि सफलता मिली। कहाकि न्याय व्यवस्था के लिए वे अपना जीवन न्यौछावर कर देंगे। वहीं गोंडा की बेटी आकांक्षा त्रिपाठी के पहले और गौरव पटेल के पांचवें स्थान पर आने से हर कोई खुश है।
जज बनकर दो बेटियों ने बढ़ाया मान
बाराबंकी जिले की दो बेटियों ने पीसीएस (जे) की परीक्षा में कामयाबी हासिल की है। सौम्या मिश्रा ने 34वीं और वर्तिका पटेल ने 349वीं रैंक हासिल कर जिले का नाम रोशन किया है। न्यायिक अधिकारी बनने वाली दोनों बेटियों ने अपनी सफलता का श्रेय कड़ी मेहनत के साथ माता-पिता के सहयोग को दिया है।
पीसीएस (जे) 2018 का अंतिम परिणाम शनिवार की देर शाम जारी हुआ। इसमें के सरावगी मोहल्ले में रहने वाली सौम्या मिश्रा ने 34वीं रैंक हासिल कर जिले का नाम रोशन किया है। पिता योगेश मिश्रा की मृत्यु के बाद मां संगीता, भाई संचित व बहन निहारिका के साथ ननिहाल में रहकर सौम्या ने तैयारी की। सौम्या ने लखनऊ की एमिटी यूनिवर्सिटी से वर्ष 2016 में एलएलबी की पढ़ाई पूरी की थी।
सौम्या ने बताया कि वर्ष 2016 में पिता की मृत्यु के बाद वह परीक्षा नहीं दे सकीं। वर्ष 2018 में पहली बार परीक्षा में शामिल होकर सफलता हासिल कर ली। सौम्या ने कहा कि मेनहत कभी खराब नहीं जाती है। प्लानिंग के साथ तैयारी की जाए तो सफलता निश्वित मिलेगी। सौम्या ने बताया कि उनके नाना वरिष्ठ अधिवक्ता ओमकारनाथ मिश्रा व मामा देशदीपक मिश्रा का तैयारी में काफी योगदान रहा। परीक्षा के दौरान मां साथ जाती थीं। शाम को रिजल्ट आने के बाद घर पर बधाई देने वालों की भीड़ जुट गई।
सिरौलीगौसपुर क्षेत्र के मसूदपुर गांव के कृष्ण कुमार वर्मा की पुत्री वर्तिका पटेल ने 349वीं रैंक हासिल कर जज बनने का सपना पूरा किया है। वर्तिका बताती हैं कि उनके पिता आईसीपीआर में नौकरी करते हैं। मां राजकुमारी वर्मा सुबह से रात तक पढ़ाई पर ध्यान देती थीं। राममनोहर लोहिया नेशनल विधि विश्वविद्यालय से वर्ष 2015 में एलएलबी करने के बाद दिल्ली यूनिवर्सिटी से वर्ष 2017 में एलएलएम किया है। वर्तिका तीन बहनें हैं। दो अन्य बहनें पल्लवी व प्रतिष्ठा को मां हमेशा पढ़ाई के लिए प्रेरित करतीं हैं। दो बेटियों की सफलता ने बाराबंकी नाम रोशन किया है।
यू-ट्यूब और एजूकेशन एप ने की परीक्षा में मदद
सोशल मीडिया समय की बर्बादी नहीं है। इसका उपयोग पढ़ाई में भी किया जा सकता है। मैंने पीसीएस-जे की तैयारी के लिए सोशल मीडिया के साथ ही यू-ट्यूब और एजूकेशन एप का भी सहारा लिया। मेरी सफलता में घरवालों के साथ ही इनका योगदान भी अहम है। यह कहना है पीसीएस-जे में पहली रैंक हासिल करने वाली आकांक्षा तिवारी का। आकांक्षा के पिता शिव पूजन तिवारी एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं और लखनऊ में रहते हैं।
आकांक्षा बताती हैं कि प्रतियोगी किताबों व अखबार से मैंने अपनी जीके पर पकड़ बनाई। बाकी विषयों की तैयारी के लिए विभिन्न किताबों और स्टडी मैटीरियल का सहारा लिया। खुद के और शिक्षकों के नोट्स भी पढ़े। परीक्षा में टॉप करने के बाद परिवारीजनों की खुशी का ठिकाना नहीं हैं। घर में सभी ने केक काटा और बधाइयां दीं। जितने भी जानने वाले हैं सभी ने फोन कर बधाई दी।
मैं भविष्य में एक उत्कृष्ट जज बनना चाहती हूं। मेरे पिता ने पढ़ाई के लिए बचपन में ही मुझे दिल्ली भेज दिया। यहीं से स्कूलिंग की और बाद में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय से लॉ करने के बाद मैं फिर से दिल्ली आ गई और पीसीएस-जे की तैयारी करने लगी। पहले ही प्रयास में मैंने पहली रैंक हासिल की है। अपने पिता, मां सरस्वती तिवारी और शिक्षकों को इसका श्रेय देती हूं।