यमुना एक्सप्रेस वे पर बस दुर्घटना में लखनऊ के सात घरों के चिराग बुझ गए, हर घर मे सन्नाटा पसरा हुआ है। इंतज़ार था तो सिर्फ खमोश बेज़ुबान जिस्म का जिसकी रूह अब उसका साथ छोड़ चुकी थी।
इंदिरानगर के ही आफताब अहमद ने अपने 45 साल के बेटे इंतखाब को यमुना एक्सप्रेस वे हादसे में हमेशा के लिए खो दिया। घर मे तीन बुज़ुर्ग सफेद कुर्ते पाजामे में बैठे थे। बेटे इंतखाब की तस्वीर को निहारते हुए आफताब कुछ कहने ही जा रहे थे कि इंतखाब की 10 साल की बेटी वहां आ पहुंची। आफताब ने इशारा किया कि बच्ची को कुछ पता नहीं है इसलिए अभी सवाल न करें।
बच्ची का नाम इस्मा है, बातों बातों में बताया कि पापा आज सुबह फीस जमा करने दिल्ली गए थे। शायद उन्हे चोट आ गयी है इसलिए वापस आ रहे हैं। इतने में दादा फफक पड़े और बच्ची ने समझाया, दादा रो नहीं, पापा को चोट ही तो लगी है, शाम तक आ जाएंगे", फिर मां बाप की फैमिली फ़ोटो दिखाया और चली गयी।
बच्ची के जाने में बाद आफ़ताब ने बोलना शुरू किया । बताया कि वह मेरा बड़ा बेटा था। दिल्ली में एक प्राइवेट फर्म में नौकरी करता था, उसकी बीवी और एक बेटी है। आज बेटी की फीस जमा की थी और दिल्ली के लिए रवाना हुआ था। सुबह टीवी पर खबर देखी तो उसे फ़ोन करना शुरू किया, लेकिन फोन का कोई जवाब नहीं आया। बार-बार फोन मिलाता रहा लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। दोपहर तक मरने वालों की एक लिस्ट आ गई। इसमें मेरे बेटे का भी नाम शामिल था, इतना कहते कहते वो रो पड़े। कहा कि 10.30 बजे तक उसकी बॉडी आएगी।