देश में एक और राज्य तेलंगाना पर यूपीए सरकार की मुहर के बाद उत्तर प्रदेश के विभाजन का मुद्दा सिर उठा सकता है।
यह आशंका इसलिए भी है कि चुनाव के पहले सियासी पार्टियां वोटों के लिए इस मुद्दे को हवा देती रही हैं। अब लोकसभा चुनाव सामने है।
ऐसे में राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष और नागरिक उड्डयन मंत्री चौधरी अजित सिंह ने यूपीए समन्वय समिति की बैठक में तेलंगाना पर चर्चा शुरू होने से पहले ही यूपी के पुनर्गठन की मांग कर डाली। बैठक के बाद भी अजित सिंह ने पुनर्गठन की मांग को जायज करार दिया।
राज्य के विभाजन का मुद्दा फिलहाल ठंडे बस्ते में है। न विभाजन के समर्थकों, न ही विरोधियों में इसे लेकर कोई सुगबुगाहट है।
अलबत्ता तेलंगाना के बहाने ठंडे बस्ते से निकलकर यह मुद्दा लोकसभा चुनाव के पहले फिर सुर्खियां बटोर सकता है। विधानसभा चुनाव के पहले भी इस मुद्दे ने कुछ दिन हलचल मचाई थी।
पिछली बसपा सरकार ने नवंबर 2011 में प्रदेश को चार हिस्सों पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बांटने संबंधी प्रस्ताव विधानसभा से पारित करवा केंद्र सरकार को भेजा था।
केंद्र ने इस मसले पर कई स्पष्टीकरण मांगते हुए प्रस्ताव राज्य सरकार को लौटा दिया था, पर बसपा सरकार ने प्रस्ताव भेजने के बाद कोई सक्रियता नहीं दिखाई। विधानसभा चुनाव में भी किसी दल ने खुलकर बसपा के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया।
दलों ने कहा था कि यह बसपा का चुनावी शिगूफा है। सरकार विरोधी माहौल से जनता का ध्यान बंटाने के लिए नया मुद्दा उछाल दिया गया है।
हालांकि विधानसभा चुनाव में राजा बुंदेला ने बुंदेलखंड और अमर सिंह ने पूर्वांचल में राज्य के विभाजन को मुद्दा बनाया, पर जनता ने दोनों को ही बुरी तरह खारिज कर दिया।
चुनाव में जनता के ठंडे रुख के बाद इन दोनों ने इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली।
सपा अकेली पार्टी है जो राज्य के विभाजन की विरोधी है, इसलिए खासतौर से मायावती और चौधरी अजित सिंह इस मुद्दे को मुलायम के खिलाफ हथियार बना सकते हैं।
दोनों के मुलायम के साथ जैसे रिश्ते हैं, उनसे कयास लगाया जा रहा है कि इस मसले पर दोनों कोर कसर नहीं छोड़ेंगे। मुलायम के साथ कोई खड़ा नजर नहीं आएगा।
मायावती ज्यादा हमलावर दिख सकती हैं क्योंकि अपनी पिछली सरकार में उन्होंने न केवल विभाजन के पक्ष में प्रस्ताव पारित कराया था बल्कि अलग तेलंगाना राज्य का भी खुलकर समर्थन किया।