श्रावस्ती। जिला गठन के बाद अधिग्रहित भूमि का पर्याप्त प्रतिकर न मिलने से व्यथित किसानों ने न्यायालय की शरण ली थी। 19 साल तक भिनगा में पैरवी करने के बाद जब फैसले की घड़ी आई तो मुकदमा बस्ती जिला न्यायालय स्थानांतरित कर दिया गया। जहां वादकारियों को पैरवी के लिए महीने में तीन से चार बार जाना पड़ता है।
श्रावस्ती जिले के अधिग्रहण की अधिसूचना 22 मई 1997 को जारी हुई थी। जिसका मुख्यालय भिनगा बनाया गया था। यहां आवासीय व अनावासीय सरकारी भवनों के निर्माण के लिए पूरे खैरी, गलकटवा, टंड़वा बनकटवा, मटखनवा, लोनियनपुरवा, बगुरइयां, बालूपुरवा, वर्गीवर्गा व सिसवा सहित आसपास के गांव के किसानों की भूमि का अधिग्रहण किया गया था। तब किसानों को न्यूनतम दर पर भूमि का प्रतिकर दिया गया। जिससे नाराज किसानों ने जिला न्यायालय की शरण ली थी। जहां 19 साल तक मामले की सुनवाई चली। जब फैसले की घड़ी आई तो तत्कालीन पीठासीन अधिकारी के स्थानांतरण के बाद पत्रावली अनडेटेड छोड़ दी गई।
करीब तीन साल तक पक्षकार सुनवाई के लिए भटकते रहे। लेकिन न तो पत्रावली न्यायालय आई और न ही उसमें कोई अग्रिम डेट लगी। विगत जून में पक्षकारों को पता चला कि उनकी पत्रावली बस्ती जिला न्यायालय स्थानांतरित कर दी गई है। जहां स्पेशल जज भूमि अध्याप्ति त्वरित न्यायालय में सुनवाई होगी। जहां जून से अब तक लोग पैरवी के लिए माह में तीन से चार बार बस्ती जा रहे हैं।
समय व पैसा दोनों हो रहा बर्बाद
अधिग्रहित भूमि के प्रतिकर के लिए बस्ती न्यायालय में पैरवी कर रहे बगुरइयां निवासी पूर्व शिक्षक केशव राम पांडेय का कहना है कि भिनगा में हमारा मुकदमा फैसले के करीब था। लेकिन सरकार के नए फरमान से हमें बस्ती का चक्कर लगाना पड़ रहा है। अनंतराम त्रिपाठी बताते हैं कि भिनगा में मुकदमे की पैरवी पर 100-200 रुपये ही खर्च होते थे। अब बस्ती आने-जाने में ही हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। माह में तीन-चार बार पेशी लगती है। जिससे चार से पांच हजार रुपये खर्च हो रहे हैं। संजय तिवारी का कहना है कि भिनगा से बस्ती के लिए कोई सीधी बस सेवा न होने के कारण या तो वाहन बुक कराकर जाना पड़ रहा है। या फिर एक दिन पहले ही घर से निकलना पड़ता है। इससे समय व पैसा दोनों बर्बाद हो रहा है। ऐसा ही कहना अन्य पक्षकारों का भी है। जो मुकदमा बस्ती स्थानांतरित होने से परेशान दिखे।